30 अप्रैल से 1 जून तक भारतीय शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट से एफआईआई ने 12,898 करोड़ रुपए निकाले हैं, जबकि घरेलू निवेशक सस्थाओं या डीआईआई ने 15,654 करोड़ रुपए डाले हैं। इसके बावजूद बीएसई सेंसेक्स इस दौरान मात्र 0.19% बढ़ा है। डीआईआई में भी म्यूचुअल फंडों व बैंकों ने कमोबेश हाथ खींच रखा है। निजी बीमा कंपनियों का धंधा मंदा है तो अधिकांश धन एलआईसी ही लगा रही है। लेकिन कब तक? अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

एफआईआई का भारतीय शेयर बाज़ार व बांडों से निकलना दुष्चक्र जैसा है। उनकी निकासी से देश में डॉलर की मात्रा घट जाती है तो डॉलर महंगा और रुपया सस्ता हो जाता है। अप्रैल के शुरू में जो डॉलर 65 रुपए का हुआ करता था, वो बाद में 68.70 रुपए तक चला गया। नीतजतन, रुपए में 5.69% अधिक कमाई भी एफआईआई के लिए डॉलर में ज़ीरो हो गई। बाज़ार गिरने की मार अलग से। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

अमेरिका में ब्याज दरें आगे बढ़ सकती हैं। इसलिए वहां के सरकारी बांडों पर यील्ड का बढ़ना तय है। वहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था की फौरी कमज़ोरी व राजनीतिक दुविधा उम्मीद के बल पर जमकर फूले शेयर बाज़ार को दबा सकती है। केयर रेटिंग्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2018 की तिमाही में 1377 लिस्टेड कंपनियों की शुद्ध बिक्री के बढ़ने की दर घटकर 9.1% पर और शुद्ध लाभ मार्जिन 6.3% आ गया है। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

दुनिया का हर निवेशक कम रिस्क में ज्यादा रिटर्न पाना चाहता है। विदेशी निवेशक भी इसी चाहत के वास्ते भारत से निकलने लगे हैं। अमेरिकी डॉलर को सबसे सुरक्षित मुद्रा और अमेरिकी सरकार के ट्रेडरी बांडों को सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है। दस साल के अमेरिकी बांड पर यील्ड अभी 2.92% चल रही है, जबकि पंद्रह दिन पहले 3.12% तक चली गई थी। वहीं भारतीय रुपए व बाज़ार की हालात डांवाडोल है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी