महीने भर से गिर रहा शेयर बाज़ार कितना और गिरेगा, कहा नहीं जा सकता। सोमवार, 3 सितंबर से शुक्रवार, 5 अक्टूबर तक बीएसई सेंसेक्स 10.27%, मिडकैप सूचकांक 16.67% और स्मॉलकैप सूचकांक 19.37% गिर चुका है। आशा अब निराशा में बदलने लगी है। ठीक महीने भर बाद दिवाली है। डर है कि इस बार की दिवाली कहीं काली न पड़ जाए। लेकिन संभलकर चुना जाए तो शुभ लाभ के बहुतेरे अवसर हैं। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

देशी-विदेशी संस्थाओ की खींचतान, एलआईसी पर बढ़ता बोझ और सिस्टम में नकदी के संकट की आशंका। ये हुए ढाई कारक, जिन्होंने इस वक्त भारतीय शेयर बाज़ार को मथ रखा है। ज्योतिष की भाषा में इस ढय्या कह सकते हैं। साढ़े साती में से ढाई कारक निकल गए तो बाकी बचे पांच कारक। कारक नहीं, बल्कि इन्हें अनिश्चितता कहा जाना चाहिए। पहली अनिश्चितता यह है कि आठ महीने बाद मोदी सरकार रहेगी या नहीं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

इंफ्रास्ट्रक्चर व हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों ने कमर्शियल पेपर जैसे ऋण-प्रपत्रों में हाल में जिस तरह डिफॉल्ट किया, उससे डर लगा कि कहीं सिस्टम में नकदी का संकट न पैदा हो जाए। बैंकों के बढ़ते एनपीए का संकट पहले से था। सरकार एलआईसी पर आईडीबीआई बैंक का बोझ डाल चुकी है। वैसे, आईएल एंड एफएस में सत्यम की तरह नया निदेशक बोर्ड बना दिया गया है। पर, एलआईसी को ही उसका उद्धार करना होगा। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार में ज्वार-भाटे जैसे स्थिति है। निफ्टी 150 से 200 अंकों का उतार-चढ़ाव झेल रहा है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि जहां विदेशी निवेशक संस्थाएं बराबर बेच रही हैं, वहीं म्यूचुएल फंड व बीमा कंपनियों जैसी देशी निवेशक संस्थाएं बराबर खरीद रही है। इनके बीच का असंतुलन बाजार में असामान्य हलचल का सबब बन जा रहा है। ऊपर से आईएल एंड एफएस जैसी कंपनियों के डिफॉल्ट ने परेशानी बढ़ा रखी है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी