अटल सत्य है कि शेयर बाज़ार के निवेश व ट्रेडिंग में भारी रिस्क है। इसे कोई मंत्र-तंत्र, विद्या या भगवान भी नहीं पलट सकता। हम अधिक से अधिक यही कर सकते हैं कि न्यूनतम रिस्क में अधिकतम रिटर्न की राह निकालें। बेंजामिन ग्राहम से लेकर वॉरेन बफेट जैसे सफलतम निवेशक और जॉर्ज सोरोस जैसे ट्रेडर यही करते रहे हैं। उन्हें भी नुकसान झेलना पड़ा है। लेकिन वे हमेशा अपनी पूंजी बचाकर चलते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बिजनेस चैनलों पर आने वाले एनालिस्टों का तो धंधा ही है हांकना और ऐसे दावे करना कि बाज़ार ठीकठाक कहां और किधर जाएगा। उन्हें इसी बात के नोट मिलते हैं। लेकिन हमारे आसपास ऐसे निवेशकों, ट्रेडरों व गुरुओं की कोई कमी नहीं जो सोशल मीडिया के साथ-साथ कहीं भी मिलने-मिलाने पर दावा करते हैं कि उन्हें बाज़ार की सटीक चाल पता है। उनका यह आत्मविश्वास अपने साथ औरों को भी डुबा डालता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

कहते हैं बिना डूबे मोती और बगैर तकलीफ उठाए सुख नहीं मिलता। अंग्रेज़ी में यही बात ‘नो पेन, नो गेन’ के रूप में कही जाती है। लेकिन इस कहावत के बल पर रिस्क लेने को ललकारनेवाले यह नहीं बताते कि ‘पेन’ हमेशा ‘गेन’ से कम होना चाहिए। अन्यथा, पीड़ा व तकलीफ हमें इसकदर तोड़ डालती है कि उठना दूभर हो जाता है। वित्तीय बाज़ार के ट्रेडर को यह सीमा हमेशा याद रखनी चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

इस समय बाज़ार पर नकदी के संकट का डर छाया हुआ है। इससे गैर-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) और बैंकों के ही नहीं, इन्फोसिस जैसी आईटी कंपनी तक के शेयरों में बिकवाली चल पड़ी है। चूंकि नकदी के संकट में संस्थाओं को फौरन कैश चाहिए तो उनके लिए खूब चलते मजबूत स्टॉक्स से मुनाफा निकालना सबसे आसान होता है। इस तरह बाज़ार की भगदड़ मुनाफा कमा रही कंपनियों को भी बहा ले जाती है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार अचंभों से भरा हुआ है। जो आप कभी सोच नहीं सकते हो, वही अचानक हो जाता है। तब सारे के सारे नियम, सारी की सारी गणनाएं धरी रह जाती हैं। फंडामेंटल या टेक्निकल, कोई एनालिसिस नहीं काम आती। कभी नोटबंदी जैसा बड़ा कदम शेयर बाज़ार का कुछ बिगाड़ नहीं पाता तो कभी आईएल एंड एफएस का छोटा-सा डिफॉल्ट भी बड़ी गिरावट शुरू कर देता है। ट्रेडरों को यह समझ लेना चाहिए। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी