पांच साल पहले मोदी सरकार आई तो लगा कि जल्दी ही वह अर्थव्यवस्था की विकास दर को दहाई अंक में ले जाएगी। 2014-15 की आर्थिक समीक्षा में तो बाकायदा ऐलान कर दिया गया कि भारत उस ऐतिहासिक मुकाम पर आ गया है जहां से वह दस प्रतिशत से ऊपर की विकास यात्रा शुरू कर सकता है। लेकिन फरवरी 2015 में की गई यह घोषणा बाद के चार सालों में दिवास्वप्न बनकर रह गई। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

अर्थव्यवस्था के सारे इंजिनों को एकसाथ फायर करनेवाले बजट की तारीख आ ही गई। फरवरी में तो अंतरिम बजट आया था जिसका मकसद चुनावों में सरकार की हवा बनाना था। मोदी सरकार की बम्पर जीत के बाद समूचे देश की उम्मीदें चरम पर हैं। कॉरपोरेट से लेकर व्यापारी, नौकरीपेशा लोग, किसान व गरीब तक अब हवा-हवाई नहीं, ठोस काम की उम्मीद लगाए बैठे हैं। वित्त मंत्री के सामने इस बार बड़ी चुनौती है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

अर्थव्यवस्था की लटें शिव की जटाओं की तरह उलझी हुई हैं। एक लट खुलते ही गंगा बह निकलती है। अर्थव्यवस्था की लटें भी जितनी अच्छी तरह खोली जाएं, देश में विकास की गंगा उतनी ही बेधड़क बहने लगती है। हर साल बजट इन्हीं लटों को खोलने का काम करता है। देखना यह है कि पांच साल के कदमताल के बाद मोदी सरकार नए कार्यकाल के पहले बजट में क्या करती है। तथास्तु में एक और संभावनामय कंपनी…औरऔर भी

जब देश की 55 प्रतिशत खेती मानसून के भरोसे हो तो किसान आसमान ही नहीं, सरकार की तरफ भी बड़ी उम्मीद से देखता है। इस बार अभी तक मानसून की बारिश औसत से काफी कम रही है तो सरकार से उम्मीदें कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं। वैसे भी पांच साल कदमताल करने के बाद पहले से ज्यादा प्रचंड बहुमत से दोबारा सत्ता में आई सरकार से किसान ही नहीं, सारा देश बेहद ठोस कामों की अपेक्षाऔरऔर भी

मुश्किल यह है कि शेयर बाज़ार में लाख पारदर्शिता के बावजूद हम देख नहीं सकते कि हमारे सौदे के सामने कौन है। हम खरीद रहे तो कौन बेच रहा है और हम बेच रहे हैं तो खरीद कौन रहा है। लेकिन दैनिक व साप्ताहिक चार्ट पर भावों का पैटर्न देखकर सोचा-समझा अंदाज़ा लगाया जा सकता है। ऐसे पैटर्न की समझ हमें न्यूनतम रिस्क में जीत की अधिकतम संभावनावाले सौदे पकड़ना सिखा सकती है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी