विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का धन बराबर आ रहा है। अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने का मुद्दा नेपथ्य में जा चुका है। एलआईसी जैसी देशी संस्थाओं का धन भी आ रहा है। कंपनियों के नतीजे भले कमज़ोर निकल रहे हों, लेकिन धन का अटूट प्रवाह चुनिंदा शेयरों को उछाले जा रहा है। सेंसेक्स और निफ्टी थोड़ा दबने के बाद फिर उठ जाते हैं। ट्रेडरों को यकीन है कि बाज़ार अनंत समय तक बढ़ता रहेगा। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार खतरनाक ज़ोन में पहुंच गया है। 16 अप्रैल 2019 को निफ्टी अब तक के सबसे ज्यादा पी/ई 29.42 पर ट्रेड हुआ। शुक्रवार, 3 मई को उसका पी/ई अनुपात 29.34 रहा है। बता दें कि 9 जनवरी 2008 को जब बाज़ार ऐतिहासिक ऊंचाई से फिसला था, तब भी निफ्टी का पी/ई अनुपात 28.22 ही था। अगले नौ महीने में 27 अक्टूबर 2008 तक वह टूटकर 10.68 के पी/ई तक गिर गया। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

चुनावों ही नहीं, शेयर बाज़ार तक में छवि का बड़ा महत्व है। नहीं तो दो रुपए का पानी बिसलेरी बनकर बीस रुपए में नहीं बिकता। सामान्य माल जब ब्रांडेड उत्पाद बनता है तो उसके विज्ञापन पर होनेवाले खर्च से कहीं ज्यादा मुनाफा कंपनी को मिलने लगता है। कोकाकोला या पेप्सी इसके नायाब उदाहरण हैं। निवेश लायक कंपनियां चुनते वक्त हमें उनके ब्रांडों की ताकत का भी ध्यान रखना चाहिए। आज तथास्तु में ऐसे ही दमखम वाली कंपनी…औरऔर भी

अब तक पिछले बीस सालों में जिन चुनावी सालों में सेंसेक्स जमकर बढ़ा है, उस दौरान वह चार मौकों पर अपने दीर्घकालिक औसत से कम पी/ई पर ट्रेड हो रहा था। लेकिन इस साल वह औसत पी/ई से ज्यादा स्तर पर ट्रेड हो रहा है। इसलिए अधिक आशंका इस बात की है कि इस साल चुनावों के बाद चाहे मोदी सरकार दोबारा सत्ता में आए या दूसरी सरकार बने, बाजार गिर सकता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी