वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को अर्थव्यवस्था की गंभीर हालत पर चिंता करनी ही पड़ी। उन्होंने उद्योगपतियों से बात की। बैंकरों व अर्थशास्त्रियों की भी राय ली। बताया जा रहा है कि उन्होंने अर्थव्यवस्था में जान फूंकने का पूरा रोडमैप तैयार कर लिया है, विस्तृत कार्यक्रम तैयार है। लेकिन सवाल उठता है कि इतनी ही समझदारी थी तो जुलाई में पेश किए गए इस साल के बजट में सार्थक उपाय क्यों नहीं किए गए? अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

देश की अर्थव्यवस्था और खपत का हाल गजब है। सोने के भाव रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं। फिर भी अपने यहां सोने का आयात इस साल अप्रैल-जून की तिमाही में 35.5% बढ़ गया। साल भर पहले की समान अवधि में इस पर खर्च विदेशी मुद्रा 8.45 अरब डॉलर थी, जबकि इस साल 11.45 अरब डॉलर रही है। इससे देश का व्यापार घाटा बढ़ गया। ऊपर से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक धन निकालते जा रहे हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

जब हर तरफ हंगामा मचा हो, भरोसा भरभराकर टूट रहा हो, तब परम्परा की सुरक्षित राह पकड़ने में ही समझदारी है। तब बहुत उछल-कूद मचाने के बजाय शांति से चलना उचित होता है और बड़ों के चक्कर में पड़ने के बजाय छोटों पर दांव लगाना कम रिस्की होता है। आज हम तथास्तु में ऐसी ही एक जमी-जमाई कंपनी पेश कर रहे हैं जो परम्परागत धंधे में लगी है और स्थाई भाव से बराबर बढ़ती जा रही है।औरऔर भी

सरकार ध्यान भटकाने और लीपापोती में लगी है। लेकिन हकीकत यही है कि बम्पर बहुमत के बावजूद मोदी सरकार ने पहले बजट में जो ढीलापन दिखाया है, उससे उद्योग व निवेश जगत काफी निराश है। कहां तो उम्मीद थी कि वह बड़े स्तर के आर्थिक सुधार करेगी और कहां वह किसी चुनावी साल की तरह वोटरों को लुभाने की कसरत करती रही। इससे उनका जनादेश ही संदेह के घेरे में आ गया है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी