विदेशी संस्थागत निवेशकों या एफआईआई ने एक बार फिर भारतीय शेयर बाज़ार में निवेश बढ़ा दिया है। बजट के बाद जहां जुलाई व अगस्त में उन्होंने यहां से क्रमशः 12,419 करोड़ व 17,592 करोड़ रुपए निकाले थे, वहीं सितंबर में उन्होंने 7548 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीद की है। हो सकता है यह उन पर घटाए गए टैक्स का नतीजा हो। लेकिन उनके बदले रुख को एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

एक सरकार ही है जो मानने को तैयार नहीं। वरना आम से लेकर खास तक, हर कोई मान चुका है कि हमारी अर्थव्यवस्था की हालत खराब है। रिजर्व बैंक तक ने चालू वित्त वर्ष 2019-20 में जीडीपी की विकास दर का अनुमान अप्रैल के 7.2% से घटाकर अब 6.1% कर दिया है। ऐसे माहौल में शेयर बाज़ार पर सरकार की कोई जुगत काम नहीं कर रही। आखिर ऐसे में निवेश का नया तरीका क्या हो सकता है?औरऔर भी

दो दिन पहले ही हमने उस बापू की 150वीं जयन्ती मनाई जिन्होंने स्वदेशी का परचम बुलंद किया था। लेकिन आज सरकार स्वदेशी पूंजी को छोड़ विदेशी पूंजी के पीछे भाग रही है। वहीं, तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां टैक्स चोरी का धन एफडीआई की खोल में दुनिया भर में घुमा रही हैं। आईएमएफ के मुताबिक 38% एफडीआई ऐसा ही है। फिर भी हमारी सरकार इस पूंजी से रोजगार पैदा करने का दम भरती रही है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सारे विदेशी निवेश का चरित्र आज संदिग्ध हो गया है। आईएमएफ के एक ताज़ा अध्ययन के मुताबिक साल 2017 में दुनिया में 15 लाख करोड़ डॉलर या 38% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश फैंटम या छलिया पूंजी के रूप में आया था। यह रकम उस साल चीन व जर्मनी के संयुक्त जीडीपी के बराबर है। इस छलिया पूंजी का 85% से अधिक हिस्सा मॉरीशस, लक्ज़मबर्ग, सिंगापुर, नीदरलैंड व स्विटज़रलैंड जैसे दस देशों से आया था। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी