बड़े बढ़ते गए, छोटों का पुछत्तर नहीं
हमारे शेयर बाज़ार में पिछले 22 महीनों में सबसे ज्यादा मार स्मॉल और मिडकैप स्टॉक्स को झेलनी पड़ी है। जहां विदेशी व देशी धन लार्जकैप कंपनियों की तरफ बहता रहा, वहीं स्मॉल व मिडकैप कंपनियों का कोई पुछत्तर नहीं रहा। इससे अच्छा बिजनेस कर रही छोटी व मध्यम कंपनियों के भी शेयर गिरते रहे। उनसे और ज्यादा निवेश निकला, जबकि बड़ी कंपनियों में निवेश बढ़ता ही गया और उनके शेयर चढ़ते ही गए। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी
मुठ्ठी भर मस्त, बाकी सब पड़े लस्त
धन के प्रवाह से पूरा शेयर बाज़ार नहीं, उसका छोटा-सा हिस्सा चढ़ा है। एनएसई की 1500 से ज्यादा कंपनियों के एक सैम्पल के अध्ययन से पता चलता है कि उनके शेयरों के भाव जनवरी 2018 के बाद से औसतन 44% गिर चुके हैं। इस गिरावट का मध्यमान या मीडियन निकालें तो वह 53% निकलता है। हां, इतना जरूर है कि शीर्ष की 100 कंपनियों में से 55 के शेयर जमकर चढ़ गए हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी
म्यूचुअल फंडों को धन की तंगी नहीं
चालू वित्त वर्ष 2019-20 में अब तक म्यूचुअल फंड उद्योग में प्रति माह औसतन 9.24 लाख एसआईपी खाते जुड़े हैं। इनमें से हर एसआईपी खाते से महीने में होनेवाला औसत निवेश 2900 रुपए का है। फिलहाल स्थिति यह है कि म्यूचुअल फंडों को प्रति माह एसआईपी से लगभग 8000 करोड़ रुपए का निवेश मिल जा रहा है। माल कम बिक रहा हो, अर्थव्यवस्था सुस्त हो, फिर भी बाज़ार में निवेश आ रहा है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी
शिकारी कुकुरमुत्तों से सावधान!
हर तरफ वित्तीय असुरक्षा छाई हो, काम-धंधा छूटने का डर हो और कमाई ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पा रही हो, तब शेयर बाज़ार से नोट कमाने का लालच किसी को भी बांध सकता है। लोगों की इसी असुरक्षा और लालच का शिकार करने के लिए हज़ारों फ्रॉड बाज़ार में उतरे हुए हैं। टिप्स बांटने का धंधा बंद हुआ तो ‘विद्या’ सिखाने के इंस्टीट्यूट कुकुरमुत्तों की तरह उग आए। इनसे सावधान रहें। तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी







