अर्थनीति कभी सच को नज़रअंदाज़ नहीं करती। लेकिन हमारी मौजूदा राजनीति का हाल गजब है कि वह झूठ पर ही फल-फूल रही है। हकीकत स्वीकार लेने से उसकी तौहीन होती है। अन्यथा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा नहीं कह सकते थे कि पांच साल पहले देश की अर्थव्यवस्था तबाह हो रही थी जिसे उनकी सरकार ने संभाल लिया। वे स्वीकार करने को तैयार नहीं कि आज आर्थिक विकास की स्थिति बदतर हो चुकी है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बाज़ार बढ़ने का मतलब कतई यह नहीं कि यहां हर कोई माने बैठा है कि हमारी अर्थव्यवस्था और कॉरपोरेट क्षेत्र की हालत बहुत अच्छी चल रही है। सच्चाई से किसी का इनकार नहीं। लेकिन चूंकि इफरात धन सीमित स्टॉक्स का पीछा कर रहा है तो उनके भाव बढ़ते जा रहे हैं और निफ्टी व सेंसेक्स नया ऐतिहासिक शिखर बना रहे हैं। पिछले कुछ हफ्तों से विदेशी संस्थाओं ने भी खरीद बढ़ा दी है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

कहा जा सकता है कि शेयर बाज़ार पूरी अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि कॉरपोरेट क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है, वह भी केवल ढाई-तीन हज़ार लिस्टेड कंपनियो का। इसमें भी जिन शीर्ष सूचकांकों से हम बाज़ार की स्थिति मापते हैं, उनमें तो 30 से लेकर 50 कंपनियां ही शामिल हैं। इनके शेयर चढ़ रहे हैं तो शेयर बाज़ार चढ़ता दिखाई देता है, जबकि बाकी छोटी व मझोली कंपनियों के शेयर डूबते ही जा रहे हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

अर्थव्यवस्था के साथ-साथ हमारे कॉरपोरेट क्षेत्र की हालत भी खस्ता चल रही है। यह हकीकत रिजर्व बैंक की एक ताज़ा रिपोर्ट में स्वीकार की गई है। इस रिपोर्ट में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की 2696 कंपनियो का लेखा-जोखा लिया गया है। उसका कहना है कि इन कंपनियों का शुद्ध लाभ सितंबर 2019 की तिमाही में साल भर पहले से 54.3% कम रहा है। इसकी सीधी वजह उनके उत्पादों की मांग का काफी घट जाना है। अब सोमवार की दृष्टि…औरऔर भी