हमारे शेयर बाज़ार के बढ़ने और कंपनियों के शेयर के चढ़ने का मूलाधार है भारत की विकासगाथा। इस विकासगाथा के दो मूल आधार हैं। एक, हमारी बड़ी आबादी और बड़ा मध्य-वर्ग जो देश में उपभोग का बड़ा बाज़ार बनाता है। हमारा खाता-पीता मध्यवर्ग इतना बड़ा है कि उसमें पूरा यूरोप समा जाए। दूसरा मूल आधार है आबादी का 65% हिस्सा जिसकी उम्र 35 साल से कम है, जिसे हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड भी कहा जाता है। उपभोग काऔरऔर भी

हमारे शेयर बाजार में तात्कालिक सुधार की सबसे बड़ी चुनौती है इक्विटी डेरिवेटिव्स के उन्माद को थामकर कैश बाज़ार को ज्यादा गहरा व व्यापक बनाना क्योंकि वही पूंजी-निर्माण और मूल्य-खोज का असली साधन है। डेरिवेटिव्स तो केवल बड़े संस्थागत निवेशकों के लिए रिस्क को संभालने और हेजिंग का ज़रिया भर हैं। वो तो असल में रिटेल ट्रेडरों व निवेशकों के लिए वर्जित क्षेत्र होना चाहिए। यकीनन, भारतीय शेयर बाज़ार का जाल काफी फैल चुका है। देश केऔरऔर भी

लालच जब भीड़ पर सवार हो जाए तो उसे भेड़ बनते देर नहीं लगती। लालच में चली भेड़चाल को रोक पाना सेबी ही नहीं, किसी भी नियामक के लिए मुश्किल है। ऐसे में हम रिटेल या व्यक्तिगत ट्रेडरों को ही आत्म-नियंत्रण का परिचय देना होगा। मोटी-सी बात है कि शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में कमाना या गंवाना शुद्ध रूप से प्रोबैबिलिटी या प्रायिकता का खेल है। साफ दिख रहा है कि डेरिवेटिव ट्रेडिंग में 91% व्यक्तिगत ट्रेडरऔरऔर भी

आखिर शेयर बाज़ार के इक्विटी डेरिवेटिव सेगमेंट (ईडीएस) पर इतनी भारी तादाद में व्यक्तिगत निवेशक पतंगों की तरह जलकर मर जाने के लिए क्यों टूटे पड़े हैं? इसकी सबसे बड़ी वजह है लीवरेज या कम लगाकर काफी ज्यादा पाने की गुंजाइश। निफ्टी ऑप्शंस का न्यूनतम लॉट अब 75 का है। किसी ने 24,950 के स्ट्राइक मूल्य के निफ्टी-50 का पुट ऑप्शंस 26.05 रुपए के भाव से खरीदे तो उसे 75 के लॉट के लिए 1953.75 रुपए देनेऔरऔर भी

पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी बराबर कोशिश कर रही है कि इक्विटी डेरिवेटिव्स को भयंकर सट्टेबाज़ी की गिरफ्त से निकालकर कैश सेगमेंट के रिस्क को संभालने का बेहतर ज़रिया बना दिया जाए। इसके लिए उसने नवंबर 2024 से चल रही पहल के साथ ही 29 मई 2025 से कुछ नए नियम लागू किए हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि इक्विटी डेरिवेटिव सेगमेंट (ईडीएस) में व्यक्तिगत ट्रेडरों के उमड़ने और घाटा खाने के क्रम पर कोईऔरऔर भी