सिस्टम तो बन गया, समस्या नहीं सुलझी
छोटे उद्योग-धंधों के भुगतान की समस्या हल करने के लिए ट्रेड रिसीवेबल डिस्काउंटिंग सिस्टम या ट्रेड्स (TReDS) जनवरी 2017 से लागू कर दिया गया। फिर भी यह समस्या उस गति से नहीं सुलझी, जिस गति से सुलझनी चाहिए थी। 2021 के अंत तक इन एमएसएमई इकाइयों का ₹10.7 लाख करोड़ का भुगतान बड़ी सरकारी व निजी कंपनियों के पास अटका पडा था। मार्च 2024 तक भी यह रकम घटकर ₹7.34 लाख करोड़ पर पहुंच सकी। यह रकमऔरऔर भी
मनमोहन की पहल छः साल अटकी रही
बड़ी सरकारी और निजी कंपनियों द्वारा एमएसएमई इकाइयों का भुगतान लटकाने की समस्या सुलझाने के लिए मनमोहन सिंह सरकार ने साल 2011 में फैक्टरिंग रेग्युलेशन एक्ट बनाया था। यह सही दिशा में उठा कदम था और इसने एमएसएमई की फाइनेंसिंग व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए एक कानूनी फ्रेमवर्क बना दिया। फिर भी समस्या सुलझी नहीं। साल 2014 में रिजर्व बैंक ने इस बाबत एक कॉन्सेप्ट पेपर पेश किया, जिसके आधार पर आज का ट्रेड रिसीवेबल डिस्काउंटिंग सिस्टमऔरऔर भी
अर्थव्यवस्था की रीढ़ पर हो रहा हमला!
एमएसएमई क्षेत्र हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, चाहे वो निर्यात हो या रोज़गार सृजन। लेकिन देश के सत्ताशीर्ष पर बारह सालों से बैठा शक्स इस रीढ़ को ही तोड़ने में लगा है। यह कितना बड़ा छलिया है कि सत्ता संभालने के पहले दिन से खुद को इस क्षेत्र को रहनुमा बताता रहा है। इसके झूठ को मीडिया का भोंपू इतना बढ़ा देता है कि उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम हर कोने से त्राहिमाम करते इस क्षेत्र की पुकार किसी कोऔरऔर भी
मैन्यूफैक्चरिंग के बिना सेवा क्षेत्र हवाई!
दुनिया के आर्थिक इतिहास में आज तक विकासशील देश से विकसित देश बनने तक की यात्रा हमेशा मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र पर सवार होकर ही पूरी हुई है। ब्रिटेन, अमेरिका, जापान व दक्षिण कोरिया से लेकर ताइवान और चीन तक इसी राह से गुजरे हैं। हालाकि चीन अभी तक विकसित देश नहीं बना है। लेकिन अपनी मैन्यूफैक्चरिंग के दम पर आज वो दुनिया की फैक्टरी बन चुका है। भारत को 2047 तक विकसित देश बनना है तो वो मैन्यूफैक्चरिंगऔरऔर भी






