शेयर बाज़ार डर और लालच की आदिम भावनाओं से चलता है। अक्सर ये भावनाएं इतनी हावी हो जाती हैं कि कंपनियों की मूलभूत स्थिति कोई मायने ही नहीं रखती। कंपनी का कोई धंधा ही नहीं। है भी तो अभी चल नहीं रहा। फिर भी उसके शेयर आसमान छूने लगते हैं। अडाणी ग्रीन एनर्जी का शेयर इसका शानदार उदाहरण रहा है, जब सच्चाई को नज़रअंदाज़ लालच उसके सिर चढ़कर बोल रहा था। हालांकि कभी-कभी कंपनियों के प्रवर्तकों सेऔरऔर भी

मार्च 2020 में जब चीन से कोरोना फटकर सारी दुनिया में फैला तो कहा गया कि यह आपदा भारत के लिए शानदार अवसर है। दुनिया ‘चाइना प्लस वन’ नीति अपनाएगी और इसका भरपूर फायदा भारत को मिलेगा। लेकिन पांच साल बाद पता चला कि सारा फायदा बांग्लादेश, वियतनाम, इंडोनेशिया व मलयेशिया जैसे देश ले गए। ऊपर से चीन भारत में घुसता चला गया और हमारी सारी मैन्यूफैक्चरिंग चीन पर निर्भर हो गई। आज उस प्रसंग को भुलाकरऔरऔर भी

कभी बोला कि सौ दिन में विदेश में जमा कालाधन वापस ले आऊंगा। कभी कहा कि 50 दिन दे दो, भ्रष्टाचार खत्म कर दूंगा, आतंकवाद की रीढ़ तोड़ दूंगा। इसी बीच 2047 तक विकसित भारत की दूर की कौड़ी उछाली गई। पहले हर साल दो करोड़ रोज़गार, अब दो साल में 3.5 करोड़ रोज़गार। बड़ी-बड़ी बातें, मगर नतीजा शून्य। देश में रोज़गार पैदा करना बड़ी चुनौती है। अगर बढ़ती आबादी को सोखना है तो साल 2030 तकऔरऔर भी

मुफ्त राशन देकर 81.35 करोड़ गरीबों को मुरीद बना लो। प्रोत्साहन स्कीम में सब्सिडी देकर मैन्यूफैक्चरिंग बढ़ाने का दावा और अब प्रोत्साहन से ही प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना में 3.5 करोड़ से ज्यादा नई नौकरियों का सृजन। बाज़ार शक्तियों की परवाह नहीं। सरकार को लगता है कि वो ही सर्वशक्तिमान है। उसे दिखता नहीं कि उसकी इन नीतियों के चलते देश के जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 17.9% से घटते-घटते 2024-25 में 12.6% पर आ गया,औरऔर भी

रॉबर्ट लाइटहाइज़र डोनाल्ड ट्रम्प की पिछली सरकार में 2017 से 2021 तक अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि रहे हैं। उन्होंने 2023 में प्रकाशित अपनी किताब ‘नो ट्रेड इज़ फ्री’ में लिखा है, “जब भी मैं भारतीय अधिकारियों से वार्ता करता था तो देश के करीब 15 खरबपतियों में हर किसी की जीवनी अपनी डेस्क पर रखता था। भारत सरकार की स्थिति का अनुमान लगाने के लिए मैं इन्हीं लोगों के हितों पर गौर करता था।” लाइटहाइज़र इस समयऔरऔर भी