ज्यादा लाभ की चुनौती, हमें देना है उन्हें मात
साल का आखिरी ट्रेडिंग सत्र। साथ ही जनवरी 2022 के डेरिवेटिव सौदों के चक्र का पहला दिन। एफआईआई या एफपीआई क्रिसमस की छुट्टियां मनाकर नए साल के लिए नई आवंटित पूंजी के साथ जल्दी ही हमारे बाज़ार में फिर गोता लगाएंगे ताकि मुनाफे का जखीरा यहां से निकाल सकें। यकीनन, अमेरिका से लेकर यूरोप तक में मुद्रास्फीति चरम पर है। अमेरिका में 1982 के बाद और यूरोप में 1997 में साझा हिसाब-किताब रखने के साल से सबसेऔरऔर भी
गुजरता साल तो अच्छा रहा, नया नहीं आसान
जो गया वो बीत गया। यकीनन बीतता साल शेयर बाज़ार के ट्रेडरों और निवेशकों के लिए काफी अच्छा रहा है। पांच-सात दिन के ट्रेडर भी इस दौरान दो-तीन महीने के ट्रेड से कमाने लगे। धन के बराबर बने प्रवाह में ट्रेडर मजे से तैरते रहे। बिना किसी साफ रणनीति के इफरात धन वालों ने बाज़ार से जमकर कमाया है और अब मौज कर रहे हैं। बेहद कमज़ोर स्टॉक्स को छोड़ दें तो निवेशकों ने भी अच्छा लाभऔरऔर भी
व्यापारी का मार्जिन नहीं, बढ़ेगा ट्रेडर का लाभ
सारे लक्षण यही हैं कि नए साल में महंगाई, खासकर खाद्य मुद्रास्फीति में उछाल आ सकता है। समस्या यह भी है जिन देशों के पास खाद्य वस्तुओं की अच्छी उपलब्धता है, वे भी मुंद्रास्फीति से लड़ने की भावी योजना बनाते हुए उनका निर्यात करने से बच रहे हैं। ऐसे में हर देश को खाद्य मुद्रास्फीति से अकेले-अकेले निपटना होगा। यह सबसे लिए बड़ी कठिन चुनौती है। यह कितनी गंभीर हो सकती है, इसका अंदाज़ा संयुक्त राष्ट्र सेऔरऔर भी
सप्लाई चेन टूटी, जलवायु असंतुलन भी बढ़ा!
संकट तब से सुलग रहा है, जब से मार्च 2020 में कोरोना से निपटने के लिए देश में लॉकडाउन लगा। मजदूर विस्थापित हो गए। जो गांव लौटे, वे वापस लौटे तो सही। मगर इधर-उधर बिखर गए। सप्लाई की कड़ियां टूट गईं। फिर पेट्रोल-डीजल के दाम। कच्चे माल से लेकर ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ती गई। इसके ऊपर से ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु में असंतुलन से उपजी विकराल समस्याएं। मसलन, अमेरिका के जंगलों में लगी आग। इससे कैलिफोर्निया वऔरऔर भी
मुद्रास्फीति का दुष्चक्र, फांस शेयर बाज़ार की!
दुनिया भर में चरम पर पहुंचती मुद्रास्फीति ने सरकारों को ही नहीं, इन्वेस्टमेंट बैंकरो, वित्तीय बाजार के ट्रेडरों और केंद्रीय बैंकरों तक को परेशान कर रखा है। इसमें भी सबसे खतरनाक है खाद्य मुद्रास्फीति का बेहिसाब बढ़ने जाना। खाना-पीना एक ऐसी चीज़ है जिसमें मुद्रास्फीति से उसकी मांग या खपत नहीं घटती। बेहद गरीब लोगों को छोड़ दें तो बाकी लोग खाने-पीने में कटौती नहीं कर पाते। इस पर बढ़े खर्च की भरपाई वे अन्य चीजों कीऔरऔर भी





