ऊपर-ऊपर चमकते-दमकते जीडीपी के नंबरों के झाग के नीचे भारतीय अर्थव्यवस्था में ऐसी विसंगतियां पनप रही हैं जो अभी तो नहीं, लेकिन भविष्य में कभी भी देश को विकराल संकट में धकेल सकती है। सारे हो-हल्ले के बावजूद भारत में निजी क्षेत्र का पूंजी निवेश नहीं हो रहा। अर्थव्यवस्था में पूंजी निवेश को दिखाता है सकल स्थाई पूंजी निर्माण (ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन) या जीएफसीएफ। यह वित्त वर्ष 2003-04 से 2007-08 के दौरान जीडीपी का 35.8% हुआ करता था। तब बिजली से लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े तमाम उद्योगों में जमकर निवेश हुआ। रिटर्न मिला नहीं तो कंपनियों पर ऋण और बैंकों पर एनपीए या डूबत ऋणों का बोझ बढ़ गया। इसे दोहरी बैलेंस शीट का संकट कहा गया। लेकिन 2016 से 2025 तक कंपनियों और बैंकों की बैलेंस शीट का संकट काफी हद तक खत्म हो गया। बीच में कोरोना महामारी का प्रकोप ज़रूर छाया। लेकिन उसके बाद भी पूंजी निवेश नहीं हो रहा। पिछले पांच सालों में औसत जीएफसीएफ जीडीपी के 30% के आसपास है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 की जून तिमाही में इसे 34.5% दिखाया गया है। लेकिन यह भावी निवेश को लेकर आश्वस्त नहीं करता। आर्थिक विकास का एक और इंजिन निर्यात है। यह 2010 से 2014 तक जीडीपी का औसतन 24.4% हुआ करता था जो वित्त वर्ष 2020-21 से 2025-26 तक 21.8% रहा है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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