सरपट जीडीपी, घटती आय बढ़ता कर्ज!

यह आभास नहीं, जिसका कोई विरोधाभास हो। यह एक साथ मौजूद सच्चाई भी नहीं कि उसे विडम्बना कह दिया जाए। यह कोई अद्भुत, अकल्पनीय व अनदेखी स्थिति भी नहीं, जिसमें कबीर की उलटबांसियों की तरह कोई सत्य या गूढ़ रहस्य छिपा हो। इसे अधिक से अधिक मोदी-जाल कहा जा सकता है कि एक तरफ भारत दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है, दूसरी तरफ अपना काम-धंधा या नौकरी करने वाले 80% भारतीयों की वास्तविक आय घटती जा रही है। किसानों और मजदूरों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। यह विकास की राह पर सरपट भागती दुनिया की कैसी अर्थव्यवस्था है कि कोरोना को बीते छह साल हो जाने के बाद भी देश की 58% आबादी को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना में हर महीने पांच किलो मुफ्त अनाज देने का सिलसिला न केवल जारी है, बल्कि इसे जनवरी 2029 तक बढ़ा दिया गया है। वो भी तब, जब सरकार डंके की चोट पर दावा करती है कि मोदीराज में 25 करोड़ लोगों की गरीबी खत्म कर दी गई है। लेकिन आम भारतीय की जिंदगी सरकारी दावों, फरमान या इश्तेहार से तो चलती नहीं। आय नहीं बढ़ रही तो रोजमर्रा की खपत जुटाने के लिए उसे ज्यादा उधार लेना पड़ रहा है। रिजर्व बैंक के मुताबिक जून 2022 से मार्च 2026 तक भारतीय परिवारों पर चढ़ा ऋण 77.91% बढ़ गया है। अब सोमवार का व्योम…

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