मोदी सरकार झूठ के तपते तवे पर कैसे राजनीति की रोटियां सेंक रही है, इसका प्रमाण है पारिवारिक उपभोग व्यय सर्वेक्षण (एचसीईएस)। एक तो उसने 2017-18 के सर्वे की रिपोर्ट अभी तक छिपा रखी है क्योंकि उसमें प्रति व्यक्ति व्यय 2011-12 की तुलना में घट गया था। दूसरे, उसने छह साल बाद अगस्त 2023 से जुलाई 2024 तक 2023-24 के पारिवारिक उपभोग व्यय का नया सर्वे किया। इस बीच दौरान कोरोना महामारी के बीच देश भर में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना अप्रैल 2020 से लागू कर दी गई थी, जिसके अंतर्गत 81.35 करोड़ लोगों को मुफ्त पांच किलो खाद्यान्न दिया जाने लगा। नए सर्वे में ऐसी सरकारी कृपा के लाभ भी जोड़ लिए गए। फिर भी जनवरी 2025 में जारी इस सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक 2023-24 में बाज़ार मूल्य पर प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय गांवों में ₹4122 और शहरों में ₹6996 रहा है, जबकि 2011-12 के आधार मूल्य पर वास्तविक व्यय गांवों में ₹2079 और शहरों में ₹3632 निकलता है। 68वे दौर के 2011-12 के सर्वे में प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय गांवों में ₹1430 और शहरों में ₹2630 था। इस तरह 12 सालों के दौरान उपभोग व्यय देश के गांवों में 3.17% औऱ शहरों में 2.73% सालाना की चक्रवृद्धि दर (सीएजीआर) से ही बढ़ा है। फिर जीडीपी के 6-6.5% बढ़ने के दावे का क्या मतलब रह जाता है? अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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