भाजपा अपनी विभाजक राजनीति के दम पर केंद्र से लेकर राज्यों तक, पूरब से लेकर पश्चिम तक सत्ता पर कब्जा करती गई। लेकिन उसकी राजनीति का मूल मकसद है जनधन या टैक्स के अकूत खजाने को खर्च करने का अबाधित अधिकार हासिल करना। टैक्स का खज़ाना तब तक नहीं बढ़ सकता, जब तक अर्थव्यवस्था नहीं बढ़ती। मगर राजनीतिक सत्ता ही नहीं रही तो टैक्स का खजाना मिल नहीं सकता। इन दो विपरीत तत्वों को साधने के लिए भाजपा ने तीन रास्ते अपनाए। एक तो उसने सत्ता तंत्र के दम पर येनकेन-प्रकारेण अपनी राजनीतिक विजय सुनिश्चित कर ली। दूसरे, उसने टैक्स वसूलने का कोई बिंदु नहीं छोड़ा। बचत को प्रोत्साहित करनेवाली सारी टैक्स रियायतें खत्म कर दीं। लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स शून्य से बढ़ाकर 12.5% कर दिया। बिना किसी सामाजिक सुरक्षा वाले देश में पेंशन तक पर टैक्स लगा दिया। पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी और सेस लगाकर उसने 12 साल में ₹43 लाख करोड़ वसूले हैं। जीएसटी जैसे परोक्ष टैक्स से सरकार को 28% कर राजस्व मिलता है। लेकिन इतना सारे टैक्स से सरकार संतुष्ट नहीं हुई। उसने सरकारी उद्यमों से लाभांश वसूली बढ़ा दी। इसके ऊपर से वो रिजर्व बैंक से अब तक ₹14,41,127 करोड़ वसूल चुकी है। इसमें से ₹2,86,588 करोड़ की रिकॉर्ड वसूली तो उसने इसी साल की है। अब मंगलवार की दृष्टि…
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