भारत का व्यापक जनमत चीन के खिलाफ है। फिर भी मोदी सरकार ने इसकी कोई परवाह न करते हुए 10 मार्च को सीमा से सटे देशों से आनेवाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के नियमों में ढील दे दी। बता दें कि इसी सरकार ने अप्रैल 2020 में जारी प्रेसनोट-3 के तहत चीन द्वारा मौका ताड़कर भारतीय कंपनियों के अधिग्रहण को रोकने के लिए कठोर नियम बनाए थे। अब चीन की कंपनियों को भारतीय कंपनियों में 10% तक मालिकाना हासिल करने की छूट दे दी है। ऑटोमेटिक रूट से इतनी इक्विटी हासिल करने के लिए उन्हें किसी की अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं। लेकिन चीन को भारत में एफडीआई लाने में कोई दिलचस्पी नहीं। उसे केवल भारत के विशाल बाज़ार में दिलचस्पी है जहां वो अपना माल खपाने में लगा है। इस बीच वित्त वर्ष 2025-26 में चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापार पार्टनर बन गया है। लेकिन यह चीन के लिए चहकने की बात है, भारत के लिए नहीं। दोनों देशों के बीच हुए 151.10 अरब डॉलर के व्यापार में चीन ने भारत को 131.63 अरब डॉलर का निर्यात किया है, जबकि चीन को भारत का निर्यात मात्र 19.47 अरब डॉलर रहा है। व्यापारिक रिश्तों में इस असंतुलन के बावजूद मोदी सरकार चीन की लल्लो-चप्पो क्यों कर रही है? भारतीय जनमत व राष्ट्रीय हितों के खिलाफ जाकर आखिर वो किसका हित साधना चाहती है? अब बुधवार की बुद्धि…
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