जो जीता, वही सिकंदर। लेकिन क्या चुनावों में जो जीत रहा है, वही सही है? यह भी कि क्या आंकड़ों में जीडीपी का बढ़ जाना ही अर्थव्यवस्था के बढ़ जाने और विकास का प्रमाण है? फिर जो प्रत्यक्ष दिख रहा है, क्या वो सरासर मनगढ़ंत, दुष्प्रचार और झूठ है? पिछले बारह साल से हम 140 करोड़ देशवासियों को बताया जा रहा है कि हेडलाइंस पर भरोसा करो। भारत दुनिया की सबसे तेज़ रफ्तार से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। हमारे जीडीपी की विकास दर ने अमेरिका व यूरोप से लेकर चीन समेत सारी दुनिया को मात दे दी है। हम अमृतकाल में हैं। यह भारत का ऐतिहासिक दौर है। लेकिन आम लोग तो हेडलाइंस में नहीं रहते। वे तो सैलरी, घर चलाने के बिल, नौकरी की खोज, स्कूल फीस, बीमारी के खर्च और छोटे-मोटे काम-धधों में जी रहे हैं या कहें तो जिए जा रहे हैं, मरे जा रहे हैं। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि कागजों पर हमारी अर्थव्यवस्था दमदार है या नहीं, उसका डंका बज रहा है या नहीं। सवाल यह कि जिन कागज़ों पर ऐसा दिख रहा है, वे खुद में कितने विश्वसनीय हैं। अगर मोदी सरकार में अक्टूबर 2014 से जून 2018 तक मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यन जीडीपी की दिखाई जा रही विकास दरों को आज बढ़ा-चढ़ा बता रहे हैं तो सारी दुनिया ज़मीनी सच जानने को उत्सुक है। लेकिन यह सच कौन सामने ला सकता है? अब मंगलवार की दृष्टि…
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