भारत का ऋण-जीडीपी अनुपात अपने-आप में ज्यादा नहीं कहा जा सकता। ब्रिक्स के मूल पांच देशों में रूस (24.8%) व दक्षिण अफ्रीका (79.5%) को छोड़ दें तो ब्राज़ील (95%) और चीन (102.3%) का ऋण-जीडीपी अनुपात हमसे ज्यादा है। विकसित देशों में अमेरिका का यह अनुपात 128.7%, ब्रिटेन का 104.8%, फ्रांस का 119.6% और जापान का 226.8% है, जबकि जर्मनी का यह अनुपात 66% है। पाकिस्तान का तो ऋण-जीडीपी अनुपात हमसे कम 71.3% है। असल दिक्कत यह है कि हमारा राजस्व आधार ठंडा पड़ता दिख रहा है। देश का सकल प्रत्यक्ष टैक्स संग्रह 17 दिसंबर 2025 तक साल भर पहले से मात्र 4.14% बढ़ा है। वहीं, तीन सालों तक बढ़ने के बाद जीएसटी का संवेग सुस्त पड़ गया है। दिसंबर महीने में हमारा शुद्ध जीएसटी संग्रह केवल 2.2% बढ़ा है। तमिलनाडु, केरल व मध्य प्रदेश जैसे बड़ी खपत वाले राज्यों में तो यह घट गया है। ऊपर से सरकार के उधार से लेकर कॉरपोरेट निवेश और बैंक ऋण को गति देनेवाली घरेलू वित्तीय बचत दर पिछले कुछ सालों में जीडीपी के 11.5% से घटकर महज 7% रह गई है। आम लोग ज्यादा ऋण लेने लगे हैं। रिजर्व बैंक पिछले एक साल में ब्याज दर 6.50% से घटाकर 5.25% कर चुका है। लेकिन सरकार लघु बचत स्कीमों पर ब्याज दर घटाने की हिम्मत नहीं कर पा रही। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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