जीडीपी महज संख्या नहीं होती। वो देश की बेहतरी और बढ़ती खुशहाली का पैमाना है। लेकिन इसे मात्र आकार तक सीमित कर देना इसकी व्यापकता को कम कर देता है। बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसा पेड़ खजूर, पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर। इसलिए तमाम देश जीडीपी से कहीं ज्यादा अहमियत देश में प्रति व्यक्ति आय को देते हैं, जिसे जीडीपी को आबादी से भाग देकर निकाला जाता है। लेकिन अपने यहां जीडीपी को लोगों की जिंदगी की बेहतरी और खुशहाली का नहीं, बल्कि झांसा देने का माध्यम बना लिया गया है। कोई यह झांसा तोड़ता है तो सरकार के कारिंदे हमलावर हो जाते हैं। इसीलिए जब देश के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार और अभी अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी में वॉटसन इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो अरविंद सुब्रमण्यन ने गहन शोध के आधार पर दावा किया कि भारत का वास्तविक जीडीपी सरकारी आंकड़ों से लगभग 22% कम हो सकता है और अर्थव्यवस्था में खपत का स्तर लगभग 31% अतिरंजित है तो मोदी सरकार के सर्वोच्च पदों पर बैठे नीति-नियामकों में खलबली मच गई। केंद्र सरकार के वर्तमान मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन और सांख्यिकी व कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव सौरभ गर्ग ने जवाबी लेख लिखा कि जीडीपी पर सवाल तो सही उठाए गए हैं, लेकिन संख्याएं गलत ली गई हैं। कैसे? अब सोमवार का व्योम…
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