करीब नौ महीने अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) ने 14 अप्रैल 2025 को जारी वर्ल्ड इकनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट में अनुमान जताया था कि कैलेंडर वर्ष 2025 या वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का जीडीपी 4.187 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है जो जापान के अनुमानित जीडीपी 4.186 ट्रिलियन डॉलर से थोड़ा ज्यादा होगा। इस तरह भारत तब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। उस समय सरकार के तमाम मंत्रियों और भाजपा नेताओं के साथ ही नीतिऔरऔर भी

भारत की अर्थव्यवस्था के साथ दुनिया में चल रही ‘ब्लैक फ्राइडे’ जैसी डील चल रही है। सरकार के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने जब शुक्रवार, 29 अगस्त को घोषित किया था कि चालू वित्त वर्ष 2025-26 की पहली, यानी जून तिमाही में हमारे जीडीपी की असली विकास दर 7.8% रही है, तब आम विद्वान ही नहीं, नॉर्थ ब्लॉक और भारतीय रिजर्व बैंक तक में बैठे नीतियां बनानेवाले बड़े-बड़े अफसरान तक चौंक गए थे। लेकिन इस बार 28औरऔर भी

अगर आपको लगता है कि बजट आपके लिए है, गांव व गरीब के लिए है, नौजवान, महिलाओं, किसानों और बुजुर्गों के लिए है, नौकरी कर रहे या छोटी-मोटी कमाई करनेवाले मध्यवर्ग के लिए है तो आप गफलत में हैं। अगर आपको कहीं से यह लगता है कि बजट समाज कल्याण, शिक्षा व स्वास्थ्य के लिए है, तब भी आप गफलत में हैं। यह बजट केवल और केवल सरकार के लिए है। इसमें अगर दरअसल किसी का कल्याणऔरऔर भी

जो कभी नहीं हुआ, वो अभी हो रहा है। शुक्रवार, 12 मार्च 1993 को जब सुबह से ही मुंबई बम धमाकों से थर्रा रही है, पूरी मुंबई में 257 लोग मारे गए और 1400 से ज्यादा घाटल हो गए, दोपहर डेढ़ बजे बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के बेसमेंट तक में जबरदस्त धमाका हुआ, तब भी अपना शेयर बाजार बंद नहीं हुआ था और उसमें सोमवार 15 मार्च से बाज़ार में बाकायदा ट्रेडिंग होने लगी। बुधवार, 26 मार्च 2008औरऔर भी

विश्व के जीडीपी में अमेरिका का योगदान 23% और वस्तु व्यापार में 12% ही है। फिर भी दुनिया का 60% उत्पादन और लोग उन देशों में हैं जिनकी मुद्रा की सांसें डॉलर में अटकी हुई हैं। अमेरिका ने दुनिया में अपना आधिपत्य 1920 से 1945 के दौरान ब्रिटेन को पीछे धकेलकर बनाया। लेकिन डॉलर की ताकत बनी रहने के बावजूद इधर अमेरिका की आर्थिक औकात कमजोर हो रही है। अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट निवेश में अमेरिकी कंपनियों का हिस्साऔरऔर भी

आज दुनिया कितनी ग्लोबल हो गई है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि अमेरिका में ऋण सीमा पर लटकी तलवार से उससे ज्यादा परेशानी चीन और जापान को हो रही है। इन देशों के मंत्रीगण अमेरिका को पटाने में लगे हैं कि किसी भी सूरत में ऐसी नौबत न आने दी जाए क्योंकि ऐसा हो गया तो उन्होंने अमेरिका को जो भारी भरकम कर्ज दे रखा है, उसे वापस पाना मुश्किल हो जाएगा। सोचिए, ऐसा तब हो रहाऔरऔर भी