लोग कहते हैं कि भारत में निवेश की लांगटर्म स्टोरी खत्म हो गई। लेकिन ऐसा अमेरिका, जापान या जर्मनी में हो सकता है, भारत में नहीं। कारण, बड़े देशों में अर्थव्यवस्था या तो ठहराव की शिकार है या कांख-कांख कर बढ़ रही है, जबकि भारत में असली उद्यमशीलता तो अब करवट ले रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था को कम-से-कम अभी 25 साल लगेंगे खिलने में। तब तक यहां फलता-फूलता रहेगा लांगटर्म निवेश। परखते हैं ऐसा ही एक निवेश…औरऔर भी

ट्रेडिंग कोई टेक्नीक नहीं, संस्कार है। यह एक दिन का कोई चमत्कार नहीं। इसके लिए मन को रत्ती-रत्ती मांजकर तैयार करना होता है, संस्कारित करना पड़ता है। कारण, अभी हमारी जो मानसिकता है, जो भी बुनावट हमें अपने संस्कारों से मिली है, वहां अहंकार है। अपने को तुर्रमखां समझने का गुरूर है। हम गलत हो ही नहीं सकते, ऐसी सोच है। और, यह सोच बाज़ार में हमें डुबाने के लिए पर्याप्त है। जो भी लोग हांकते हैंऔरऔर भी

तीसरी कसम फिल्म आपने देखी होगी या रेणु की यह कहानी शायद पढ़ी हो। इसमें सीधा-साधा नायक दुनिया के जंजाल से बचने के लिए तीन बार कसम खाता है। एक ऐसी ही कसम हम सभी को खानी होगी कि शेयर बाज़ार के ऑपरेटरों की बात पर कभी भी यकीन नहीं करेंगे। वे हमेशा अपने फायदे की सोचते हैं। शातिर ठग होते हैं। इसलिए उन्हें दूर से ही सलाम। खुले दिमाग से अब रुख करते हैं बाज़ार का…औरऔर भी

कुछ नहीं, बहुत-से लोग कहते हैं कि शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग साइंस के साथ-साथ आर्ट भी है। कला जो अंदर से आती है। लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं। ट्रेडिंग शुद्ध रूप से नंबरों का खेल है। किसी भाव पर लेनेवाले कितने हैं और बेचनेवाले कितने, इसी से तय होगा कि भाव आगे कहां जाएगा। चार्ट पर हमें चित्र-विचित्र आकृतियां नहीं, बल्कि खरीदने और बेचनेवालों का सही संतुलन दिखना चाहिए। शुरू करते हैं आज का अभ्यास…औरऔर भी

किसी भी आम ट्रेडर से पूछ लीजिए। वो आपको आराम से पंद्रह संकेतक गिना देगा जो बताते हैं कि किसी स्टॉक का भावी रुझान क्या है और उसे किस भाव पर कितने स्टॉप लॉस के साथ खरीदना/बेचना चाहिए? लेकिन यकीन मानिए, इनमें से कोई जादुई संकेतक नहीं है जो एकदम सटीक भविष्यवाणी कर सके। अपने-आप में हर संकेतक अधूरा है। उसे दो-तीन के साथ मिलाने पर ही तस्वीर थोड़ी साफ होती है। देखते हैं आज की तस्वीर…औरऔर भी

आगे क्या होगा, कोई नहीं जानता। अनिश्चितता पक्की है। इंसान अपने पूरे इतिहास में इसे ही मिटाने की कोशिश करता रहा है। ट्रेडिंग भी अनिश्चितता में संभावनाओं को पकड़ने की कोशिश है। कभी-कभी बड़े संकेतक भी धोखा दे जाते हैं। इसका मतलब कि सतह के नीचे कोई बड़ी चीज चल रही है। ऐसी सूरत में ट्रेडर को रुककर खटाक से पलट जाना चाहिए। बाज़ार से जिद करने का मतलब पिटना है। अब आज की अनिश्चितता में छलांग…औरऔर भी

नया शिकारी जंगल में हर हिलती-डुलती चीज़ पर गोली चला देता है, अपनी परछाई पर भी। वहीं कुशल शिकारी भलीभांति जानता है कि कौन-सा शिकार करना है। वो गिनती की गोलियां ही रखता है। उलझन नहीं, सरलता। अराजकता नहीं, अनुशासन। सफल ट्रेडर दस जगह हाथ-पैर नहीं मारता। चुने हुए इंडीकेटर व चुनिंदा स्टॉक्स। वो 50 के चक्कर में पड़ने के बजाय 5 स्टॉक्स में ही गहरी पैठ बनाता है। आगे है जून की पहली ट्रेडिंग के तिकड़म…औरऔर भी

मल्टीबैगर के चक्कर में बहुतेरे निवेश सलाहकार जमकर लोगों को उल्लू बनाते हैं। धन कई गुना करने की लालच में सीधे-साधे लोग तगड़ी फीस देकर निवेश कर देते हैं। उन्हें नहीं बताया जाता कि स्मॉलकैप या मिडकैप स्टॉक्स ही कई गुना बढ़ सकते हैं, जिनके गिरने का खतरा भी इतना ही भयंकर होता है। दूसरी तरफ लार्जकैप कंपनियों में निवेश के डूबने का खतरा नहीं, रिटर्न भी ठीकठाक मिलता है। पेश है ऐसी ही एक लार्जकैप कंपनी…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग या निवेश के लिए डीमैट एकाउंट का होना ज़रूरी है और अद्यतन आंकड़ों के मुताबिक इस समय देश में कुल लगभग 2.11 करोड़ डीमैट एकाउंट हैं। इसका एक फीसदी भी पकड़ें तो हर दिन करीब दो लाख लोग ट्रेडिंग या निवेश करते होंगे। लेकिन इनमें से बमुश्किल दो हज़ार ही होंगे जो बाकायदा सोच-समझ कर धन लगाते या निकालते हैं। बाकी ज्यादातर लोग यहां अनाड़ियों की तरह मुंह उठाए चले जाते हैं। वैसेऔरऔर भी

शराब, ड्रग्स या ट्रेडिंग की लत लग जाए तो बरबाद होने में वक्त नहीं लगता। खुशी की तलाश में निकले लोग अक्सर खुद को ही गंवा बैठते हैं। दरअसल, ट्रेडिंग का बुनियादी सूत्र है कि जिस भाव पर डिमांड सप्लाई से ज्यादा होती है, वहां से भाव चढ़ते हैं। इसकी उल्टी सूरत में गिरते हैं। हमें इन स्तरों का पता लगाकर खरीदना/बेचना होता है। इसलिए यहां एडिक्ट नहीं, एकदम मुक्त दिमाग चाहिए। अब हफ्ते की आखिरी ट्रेडिंग…औरऔर भी