शेयर बाज़ार के ट्रेडरों में आम रुझान यह है कि वे स्विंग, मोमेंटम या पोजिशनल ट्रेड के बजाय इंट्रा-डे ट्रेडिंग को तवज्जो देते हैं। देश में ऐसे लाखों ट्रेडर हैं। उनका लक्ष्य दिन में 1000-2000 रुपए कमा लेना होता है। कुछ तो 5000 रुपए तक कमाने के लिए कमर कसे रहते हैं। यह लक्ष्य हासिल करने के लिए बहुत से ट्रेडर 60 मिनट में सौदे से निकल जाते हैं और इस तरह सुबह 9.15 से शाम 3.30औरऔर भी

शेयर बाज़ार के निवेश और ट्रेडिंग दोनों में रिस्क है। होना यह चाहिए कि इसमें उतरनेवाले हर शख्स को अपनी रिस्क क्षमता का सही आकलन करने के बाद निवेश या ट्रेडिंग का तरीका चुनना चाहिए। लेकिन इसको लेकर नज़रिया भी अलग-अलग है। मसलन, आम धारणा है कि दो-चार साल या ज्यादा समय के लम्बे निवेश में सबसे कम रिस्क है, जबकि इंट्रा-डे ट्रेडिंग में सबसे ज्यादा। लेकिन इंट्रा-डे ट्रेडर कहते हैं कि वे तो अपना रिस्क उसीऔरऔर भी

मुद्रास्फीति बढ़ने के संकेत। बॉन्ड की यील्ड बढ़ी तो ब्याज दर बढ़ने का पूरा अंदेशा। नतीजतन, सिस्टम में पूंजी या धन की लागत बढ़ने की आहट। इसका अंदाज़ लगता है कॉल मनी की बढ़ती दरों से, जिन पर बैंक एक दूसरे को चंद घंटों के लिए उधार देते हैं। फिर, पूंजी की लागत किसी एक उद्योग-धंधे के लिए नहीं बढ़ती। सारा बिजनेस समुदाय और व्यापारिक गतिविधियां इसके लपेटे में आ जाती हैं। वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग भीऔरऔर भी

सभी वित्तीय बाज़ार आपस में जुड़े हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। इसलिए शेयर बाज़ार का ट्रेडर खुद को शेयर बाज़ार तक सीमित रखे तो शेयरों की गति का सबब नहीं जान सकता। मसलन, इस समय बॉन्ड के भाव घट रहे है तो उन पर यील्ड बढ़े जा रही है। नतीजतन, ब्याज दर बढ़ सकती है तो धन का प्रवाह घटने के भय से शेयर बाज़ार दबाव में है। कल तुर्की की मुद्रा लीरा केंद्रीय बैंकऔरऔर भी

अपने यहां मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद, कोलकाता व बेंगलुरु जैसे महानगरों ही नहीं, जयपुर, लुधियाना, कानपुर व मेरठ जैसे शहरों के साथ-साथ देश के कस्बों और गांवों तक में बेरोजगार व कम कमानेवाले लोगों को शेयर बाज़ार का चस्का लगा हुआ है। लेकिन उन्हें नहीं पता कि वित्तीय बाज़ार की दुनिया में शेयर बाज़ार सबसे छोटा है। विदेशी मुद्रा या करेंसी बाज़ार सबसे बड़ा है। वो शेयर बाज़ार से 100-200 गुना है, जबकि बॉन्ड बाज़ार 50-70 गुना औरऔरऔर भी

जो ट्रेडर सेबी के नए नियम के माफिक ज्यादा मार्जिन मनी नहीं दे पा रहे, ब्रोकर उनकी पोजिशन कम कर दे रहे हैं। जाहिर है कि वित्त वर्ष के आखिरी महीने में पहले से धन की तंगी से जूझ रहे ट्रेडर की लॉन्ग या खरीदने की पोजिशन घटती जा रही हैं। नतीजतन बाज़ार बढ़ते-बढ़ते दब जा रहा है। कुछ दिनों से यही सिलसिला जारी है। सुबह बढ़कर खुला बाज़ार दोपहर बाद घाटे में चला जाता है। आखिरीऔरऔर भी

खरीदने के सौदे ज्यादा होगे तो बाज़ार में सक्रियता बढ़ेगी। लेकिन इधर पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी ने पहली मार्च के पीक मार्जिन की सीमा घटा दी है। पहले इंट्रा-डे में निफ्टी का एक लॉट करने के लिए कोई अपने ब्रोकर के पास डेढ़ लाख रुपए मार्जिन मनी रखता था तो वह दरअसल चार लॉट की पोजिशन बना सकता था। लेकिन अब सेबी के नए नियम के मुताबिक वह दोगुना या दो लॉट की ही पोजिशन बनाऔरऔर भी

इस समय देश में बाहर से आ रहे धन की कोई कमी नहीं। म्यूचुअल फंड भी बाज़ार में धन लगाने को आतुर हैं। लेकिन बाकी ट्रेडरों के पास धन की तंगी है। दो दिन पहले ही अन्य व्यापारियों, कॉरपोरेट इकाइयों व बिजनेस करनेवालों की तरह उन्होंने मौजूदा वित्त वर्ष के एडवांस टैक्स की आखिरी किश्त भरी होगी। सालाना 10,000 रुपए से ज्यादा की करदेयता वाले सभी लोगों को एडवांस टैक्स भरना होता है। इधर, पहली मार्च सेऔरऔर भी

बाज़ार भले ही ऊपर-नीचे होता रहे। लेकिन अमूमन प्रोफेशनल व बड़े ट्रेडर मार्च अंत तक शॉर्ट सेलिंग से परहेज़ करते हैं। असल में वे जिस तरह उधार पर धन लेकर बाज़ार में लगाते रहते हैं, वह सुविधा इस दौरान काफी कम हो जाती है। कहीं से उधार पर धन जुटाना मुश्किल हो जाता है। वित्त वर्ष का अंत होता है तो हर कोई अपना एकाउंट बराबर करने में लगा रहता है। ट्रेडर नया लोन लेने के बजायऔरऔर भी

वित्त वर्ष 2020-21 का आखिरी महीना। एक महीने से निफ्टी लगातार 40 से ज्यादा पी/ई पर ट्रेड हो रहा है केवल एक दिन 26 फरवरी को छोड़कर, जब वो 39.65 के पी/ई पर था। क्या हमारा शेयर बाज़ार कुछ ज्यादा ही फूल गया है और उसका गुब्बारा कभी भी फट सकता है? शायद नहीं, क्योंकि जब तक बाज़ार में धन आता रहेगा, तब तक वह फूलता ही जाएगा। अमूमन, वित्त वर्ष के आखिरी महीने में धन काऔरऔर भी