डब्बा ट्रेडिंग में ऐसे भी मामले होते हैं कि एक्सचेंज के सर्वर पर कोई सौदा नहीं होता। क्लाएंट को घाटा हो रहा होता है, फिर भी वह सौदा नहीं काटता। वह घाटे पर सौदा काट भी ले तो ऑपरेटर उसे क्रेडिट दे देता है। असल में उसका सारा तंत्र हवा-हवाई होता है। उसे बस क्लाएंट को चूना लगाना होता है। आपसे धन लेना होगा तो ऑपरेटर आपके घर रिकवरी एजेंट भेज देगा। लेकिन उसको धन देना होगाऔरऔर भी

जो डब्बा ऑपरेटर स्टॉक एक्सचेंज के जरिए और ब्रोकर को शामिल करके आपके डब्बा ट्रेड को अंजाम देता है, वह यकीनन गैर-कानूनी काम करता है। लेकिन जो डब्बा ऑपरेटर एक्सचेंज का सहारा नहीं लेता, वह कहीं ज्यादा खतरनाक है। वह चूंकि एक्सचेंज या किसी ब्रोकर को शामिल नहीं करता तो उसे न कोई मार्जिन देना होता है और न ही ब्रोकरेज, इसलिए आपसे बहुत कम शुल्क लेता है। लेकिन वह अपनी कोई पूंजी नहीं लगाता और केवलऔरऔर भी

अपने यहां शेयर बाज़ार में सक्रिय डब्बा ऑपरेटर दो तरह के होते हैं। एक जो आपके ट्रेड को एक्सचेंज के प्लेटफॉर्म पर ले जाता है। लेकिन आप से सारी रकम कैश में लेता है। अपने खाते में अपने नाम से ही ट्रेड करता है। स्पैन से लेकर मार्क टू मार्केट मार्जिन तक देता है। यह ऑपरेटर चूंकि रिस्क ले रहा है तो इसके एवज़ में वो डब्बा ट्रेडर से पूरा ब्रोकरेज लेता है। दूसरा डब्बा ऑपरेटर वोऔरऔर भी

जब हमारे स्टॉक एक्सचेंजों में इंट्रा-डे से लेकर डेरिवेटिव ट्रेडिंग तक की पूरी सहूलियत है, तब आखिर लोगबाग डब्बा ट्रेडिंग जैसे गलत व गैर-कानूनी काम करते ही क्यों हैं? इसके कुछ बड़े साफ कारण हैं। पहला तो यह कि डब्बा ट्रेडिंग करानेवाला ऑपरेटर गैरकानूनी ट्रेडिंग कर रहा है तो वह ट्रेड करनेवालों से कोई स्पैन मार्जिन, मार्क टू मार्केट रकम वगैरह नहीं लेता, न ले सकता है। वो बहुत हुआ तो लोगों से मोटामोटी सांकेतिक या. टोकनऔरऔर भी

अगर आप शेयरों की ट्रेडिंग में दिलचस्पी रखते हैं तो डब्बा ट्रेडिंग का नाम ज़रूर सुना होगा। हर गैर-कानूनी काम की तरह यह भी हल्के-फुल्के मुंगेरीलाल टाइप लोगों को खूब खींचता है। कोई लिखा-पढ़ी नहीं, रिकॉर्ड नहीं, सारा लेनदेन कैश में, सारी कमाई काली। इनकम टैक्स देने या रिटर्न भरने का सवाल ही नहीं। सारे सौदे स्टॉक एक्सचेंज के बाहर होते हैं तो सिक्यूरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स भी नहीं। कोई दिक्कत आने या ठगे जाने पर एक्सचेंज याऔरऔर भी

सवाल उठता है कि जो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) दशकों से भारत पर लट्टू रहे हैं, नोटबंदी की तंगी और कोरोना की तगड़ी मार के बीच भी जिन्हें भरपूर उम्मीद थी, वे अब यहां से क्यों किनारा कसने लगे हैं? भारतीय शेयर बाज़ार में छह महीनों से जिस तरह उन्होंने भयंकर मुनाफावसूली की है, वह अभूतपूर्व है। जानकारों के मुताबिक एफपीआई को लगता है कि जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करनेवाला भारत दुनिया में कच्चेऔरऔर भी

दुनिया के कौन-से देश है जहां से एफपीआई के रूप में सबसे ज्यादा धन भारत के वित्तीय बाज़ार में आता है? भारत में निवेश करनेवाले शीर्ष 10-11 देशों में अमेरिका टॉप पर है। उसके बाद मॉरीशस, लक्ज़मबर्ग, सिंगापुर, ब्रिटेन, आयरलैंड, कनाडा, जापान, नॉरवे, फ्रांस व नीदरलैंड्स (हॉलैंड) का नंबर है। ध्यान दें कि इसमें यूरोप की प्रमुख अर्थव्यवस्था जर्मनी और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन का नाम नहीं है। इसकी एक वजह तो है किऔरऔर भी

विदेशी पोर्टपोलियो निवेशक (एफपीआई) तो प्रवासी पक्षियों की तरह हैं जहां अनुकूल मौसम जितने समय के लिए मिलेगा, वहां उतने समय के लिए चले जाएंगे। एफपीआई को कम से कम रिस्क में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है। उन्हें भारत से कोई विशेष अनुराग नहीं है। जहां ज्यादा मुनाफा मिलेगा, उधर का ही रुख कर लेंगे। जान लें कि भारत को अपने शेयर व वित्तीय बाज़ार की चमक बनाए रखने के लिए ज्यादा से ज्यादा एफपीआई कीऔरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार के लिए विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) का बने रहना कितना अहमियत रखता है, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि हमारा सालाना बजट अभी 39.45 लाख करोड़ रुपए का है, जबकि एफआईआई द्वारा भारत में प्रबंधित आस्तियां (ऐसेट अंडर कस्टडी या एयूसी) घटने के बावजूद फरवरी माह में 49.75 लाख करोड़ रुपए हैं जिसमें से 45.55 लाख करोड़ रुपए उन्होंने शेयर बाज़ार में लगा रखे थे। जनवरी में इनका एयूसी 52.13 लाख करोड़औरऔर भी

विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाज़ार से भागे जा रहे हैं। एनएसडीएल के आंकड़ों के मुताबिक इस मार्च महीने में 25 तारीख तक उन्होंने हमारे कैश सेगमेंट में 41,550 करोड़ रुपए की शुद्ध बिकवाली की है। जनवरी से जोड़ ले तो अब तक उन्होंने हमारे शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट से कुल 1,10,445 करोड़ रुपए निकाले हैं। वहीं, ऋण सेगमेंट या बांडों से उन्होंने इस दौरान मात्र 6141 करोड़ रुपए निकाले हैं। जानकार कहते हैं कि इसकी खासऔरऔर भी