केंद्र में एकदलीय सरकार हो या गठबंधन सरकार, 1980 के बाद अब तक के 39 सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था औसतन 6.3% सालाना की दर से बढ़ती रही है। इसमें मुद्रास्फीति का प्रभाव हटा दिया गया है। अगर उसका प्रभाव जोड़ दें तो हमारे जीडीपी की सालाना विकास दर लगभग 13% हो जाती है। इस 39 सालों में केंद्र में दस सरकारें रहीं जिनमें से केवल तीन सरकारें एक दल के बहुमत की थीं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

चुनावों के नतीजे यकीनन दो-चार, दस-पंद्रह दिन शेयर बाज़ार पर असर दिखाते हैं। लेकिन बाद में सब सामान्य हो जाता है। विदेशी निवेशकों के आने पर फर्क नहीं पड़ता, न ही घरेलू निवेशकों का जोश कमबेशी होता है। लंबे समय में भारत की विकासगाथा का दमखम बरकरार है तो शेयर बाज़ार तरन्नुम में उड़ता रहता है। केंद्र में एक दलीय बहुमत की सरकार हो या गठबंधन की सरकार हो, बाज़ार चहकता रहता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार मानकर चल रहा है कि चुनावों के बाद भाजपा दोबारा सत्ता में आएगी, भले ही एनडीए का बहुमत पहले से घट जाए। नतीजे इससे उलट हुए तो बाज़ार उस दिन भारी गिरावट का शिकार हो सकता है। 2004 में चुनाव परिणाम के दिन बाज़ार 15% से ज्यादा टूटा था। हालांकि 2009 में यूपीए के दोबारा चुने जाने पर 20% उछल गया था। लेकिन क्या चुनावी सन्निपात का असर ज्यादा खिंचता है? अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

तथ्य छिपाए जा रहे हैं। मतदाताओं को खींचने के लिए मनगढ़ंत बातें और डर फैलाया जा रहा है। हल्ला है कि सरकार बदली तो शेयर बाज़ार धराशाई हो सकता है। यह सारा शोर मचाया जा रहा है सत्ताधारी व सबसे अमीर पार्टी की तरफ से। वह अपने मकसद में कितना कामयाब होगी, यह तो 23 मई को नतीजे आने पर ही पता चलेगा। फिर भी हमें शोर और सच का अंतर समझना होगा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

इसमें कोई दो राय नहीं कि लाख हो-हल्ले के बावजूद हमारे चुनावों में कालाधन बड़ी अहम भूमिका निभाता है। एक अपुष्ट अनुमान है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में लगभग 18,000 करोड़ रुपए का कालाधन इस्तेमाल हुआ था। इसमें से अकेले भाजपा ने करीब 10,000 करोड़ रुपए खर्च किए थे। इस बार के लिए कुछ जानकारों का अनुमान है कि कालेधन का आंकड़ा आराम से 25,000 करोड़ रुपए के पार जा सकता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

चुनावी माहौल में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की अप्रत्याशित सक्रियता की वजह क्या है? इसकी जांच गहराई से होनी चाहिए। पर, मुख्यधारा का मीडिया ऐसा करेगा नहीं, बिजनेस चैनलों व अखबारों की भी इसमें कोई रुचि नहीं होगी, सरकार ऐसा करेगी नहीं और पूंजी बाज़ार नियामक संस्था सेबी भी शायद इस झंझट में न पड़ना चाहे। ऐसे में शक का उठना लाज़िमी है कि कहीं भारतीय धन ही तो घूमकर वापस नहीं आ रहा। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार में अजब उलटबांसी चल रही है। अनिश्चितता से भरे माहौल में विदेशी निवेशक अमूमन धन निकाल लेते हैं। अर्थव्यवस्था कमज़ोर होने पर यह गति ज्यादा ही तेज़ हो जाती है। लेकिन जिन एफआईआई ने साल 2018 में अपने बाज़ार से 33,014 करोड़ रुपए निकाले और इस साल जनवरी में भी 4262 करोड़ निकाल डाले, उन्होंने 20 फरवरी के बाद से कल तक 41,904 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीद की है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

न्यूज़ चैनलों से लेकर तकरीबन सारा मीडिया एकस्वर से कह रहा है कि मोदी सरकार को भले ही कम बहुमत मिले, लेकिन वो दोबारा पांच साल के लिए सत्ता में आ रही है। मगर, बाज़ार न तो मीडिया की तरह बिका हुआ है और न ही वहां हवाबाज़ी ज्यादा चलती है। इसलिए वहां एक अंतर्धारणा यह भी ज़ोर मार रही है कि केंद्र में कांग्रेस के इर्दगिर्द महागठबंधन की सरकार बन सकती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

लोकसभा चुनावों का आगाज़ होने में आज को मिलाकर अट्ठारह दिन बाकी है। इन अट्ठारह दिनों में पक्ष-विपक्ष के दावों-प्रतिदावों की महाभारत जारी रहेगी। इस दौरान कुछ सनसनीखेज़ खुलासे भी हो सकते है। सात चरणों के मतदान के बाद नतीजे 23 मई को घोषित होंगे। लेकिन एक बात अच्छी तरह याद रखें कि कुछ दिनों के झंझावत के अलावा इन चुनावों का शेयर बाज़ार पर कोई खास असर नहीं होने जा रहा है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

जहां सब कुछ एकसाथ अलग-अलग दिशाओं में इतनी तेज़ी से बदल रहा हो, वहां हम पल-पल के भावावेश में फंसे रहे तो रिस्क लेने के बावजूद सही दांव कभी नहीं पकड़ सकते। इतने झंझावात के बीच अगर सही सूत्र पकड़ना है तो उसके लिए समता भाव को आत्मसात करना ज़रूरी है। न राग, न द्वेष। न दोस्ती, न दुश्मनी। जो जैसा है, उसे समभाव से वैसा ही देखने की अंतर्दृष्टि हासिल करनी पड़ेगी। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी