इस समय बाज़ार में जो स्थिति है, वह बड़ी भ्रामक है। बमुश्किल 50-100 शेयर हैं जो कुलांचे मारे जा रहे हैं। वहीं, बाकी डेढ़ हज़ार से ज्यादा शेयर रसातल का रुख किए हुए हैं। ऐसे शेयर जब कभी थोड़ा-बहुत बढ़ते भी हैं तो फौरन मुनाफावसूली से दबा दिए जाते हैं। बाज़ार की हालत देखकर समझदार लोगों का कहना है कि इस वक्त रिस्क लेने के बजाय कैश संभालकर रखना सबसे सुरक्षित पोजिशन है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार में बढ़ने और गिरने के असंतुलित व विपरीत स्वभाव को देखते हुए संकट का पहला संकेत मिलते ही जितना मिल रहा हो, उतने पर बेचकर निकल लेना चाहिए। संस्कृत में एक कहावत है कि सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धं त्यजति पंडितः अर्थात सम्पूर्ण का नाश होते देखकर आधे को बचा लें और आधे का त्याग कर दें। हमेशा यह सच स्वीकार करके चलें कि निवेश व ट्रेडिंग निश्चितताओं का नहीं, प्रायिकताओं का खेल है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में मंदी के दौर का स्वभाव तेज़ी के दौर से एकदम उलटा होता है। मंदी में बाज़ार धीरे-धीरे नहीं, एकबारगी गिरता है। अक्सर होता यह है कि एक-दो साल में बाजार या कोई स्टॉक जितना बढ़ा होता है, वह सारी की सारी बढ़त चंद दिनों में स्वाहा हो जाती है। बहुत सारे स्टॉक्स धारदार चाकू की तरह गिरते हैं, जिन्हें पकड़ने की कोशिश में घाव और गहरे होते चले जाते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार जिस तरह से काम करता है, उसमें भावों का बढ़ना धीरे-धीरे चरणबद्ध तरीके से होता है। असल में तेज़ी का बाज़ार हमेशा धीरे-धीरे करके बनता है, एकबारगी नहीं। वह एक-एक कदम, एक-एक सीढ़ी चढ़ता है। इसकी सीधी-सी वजह है कि भरोसे को बनने और बढ़ने में वक्त लगता है। इसलिए तेज़ी के बाज़ार में मौके हाथ से खटाक से नहीं निकल जाते। चूक जाने पर उन्हें दोबारा पकड़ा जा सकता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का सारा मंसूबा इस पर टिका है कि देश में भरपूर विदेशी निवेश आएगा। शेयरों के साथ उद्योग में भी। पर बिजनेस करने की आसानी के दावों के बावजूद विदेशी निवेशकों को चीन, वियतनाम या थाईलैंड ज्यादा रास आते हैं। कारण स्पष्ट है। विश्व व्यापार में हमारा हिस्सा 2% से कम है जबकि हमारे यहां ट्रांसफर-प्राइसिंग विवाद दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा हैं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

भारत में अपनी पूंजी की कमी नहीं है। लेकिन कमाल यह है कि हमारे पूंजी बाज़ार, खासकर शेयर बाज़ार के रुख का फैसला विदेशी निवेशक करते हैं। यह हमारे बाज़ार की एक कड़वी हकीकत है जिसे हर किसी को स्वीकार करना पड़ेगा। वैसे तो विदेशी संस्थागत निवेशकों और देशी संस्थागत निवेशकों में हमेशा जुगलबंदी चलती है। एक बेचता तो दूसरा खरीदता है। लेकिन विदेशी 350 करोड़ से ज्यादा बेचें तो बाज़ार गिरता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के रूप में आखिर किसका धन आकर भारतीय शेयर बाज़ार में लगता है? इस बार मई में, जब चुनावों की अनिश्चितता छाई हुई थी, तब ऐसे निवेशक क्यों चढ़े हुए बाज़ार में भी झूमकर धन लगा रहे थे? जाननेवाले सब जानते हैं। मॉरीशस जैसे रूट बंद हो जाने पर भी कालेधन का रास्ता बंद नहीं हुआ है। नहीं तो चुनावों में 60-70 हज़ार करोड़ का कालाधन कैसे लग जाता! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

सरकार और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का अंदाज़ निराला है। एक तरफ उन्होंने इस बार बजट में एफपीआई को खुश करने की भरपूर कोशिश की। उनसे जुड़े केवाईसी मानक ढीले कर दिए ताकि उन्हें निवेश बढ़ाने में कोई दिक्कत न आए। दूसरी तरफ, जब वे ‘सुपर-रिच’ टैक्स पर एतराज जता रहे हैं तो वित्त मंत्री ने सुनने से ही इनकार कर दिया। आखिर जो टैक्स महज दिखावा है, उस पर इतनी हेकड़ी क्यों! अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

जिन विदेशी निवेशकों की तरफ इस साल के बजट में बड़ी आशा भरी निगाहों से देखा गया था, वे अभी नाराज़ चल रहे हैं। खासकर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने अपनी बेरुखी जाहिर कर दी है। इस साल जनवरी में इक्विटी से 4262 करोड़ रुपए निकालने के बाद फरवरी से जून तक 84,780 करोड़ डॉलने वाले एफपीआई जुलाई में अब तक 7712 करोड़ निकाल चुके हैं। उनकी खास नाराजगी ‘सुपर-रिच टैक्स’ से है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

हमें इस बात को लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि शेयर बाज़ार इफरात धनवालों के लिए अपनी कमाई और दौलत को बढ़ाने का जरिया है। अगर हमारे-आप जैसे सामान्य लोग भी यहां से धन बना लेते हैं तो यह शेयर बाजार का मूल उत्पाद नहीं, बल्कि बाई-प्रोडक्ट है। सच कहें कि शेयर बाज़ार आम लोगों की बचत को सोखने का ज़रिया है ताकि धनवानों को बिना किसी जवाबदेही का धन मिल सके। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी