शरीर है, तभी सब है। घर-परिवार। सुख-समृद्धि। ज्ञान-ध्यान। सबकी शुरुआत इसी से होती है और इसी के साथ इससे जुड़े हर भाव का अंत हो जाता है। बर्तन ही नहीं तो अमृत रखेंगे कहां? इसलिए सबसे पहले शरीर की शुद्धता व पात्रता जरूरी है।और भीऔर भी

ज्ञान आनंद की पहली कड़ी है। ज्ञान की आंधी के बिना भ्रम नहीं टूटता, माया का जाल नहीं छंटता। जाल नहीं छंटता तो कुंडलिनी नहीं जगती, सहस्रार कमल नहीं खिलता, हम आनंद विभोर नहीं होते।और भीऔर भी

ज़िंदगी इतनी अनिश्चित नहीं होती, दुनिया इतनी जटिल नहीं होती, लोग इतने कुटिल नहीं होते तो जीने में मज़ा ही क्या रहता! सब कुछ रूटीन, बेजान, एकदम ठंडा!! संघर्ष की ऊष्मा ही तो जीवन है।और भीऔर भी

जीतने के भाव के साथ ही जीने का आनंद है। बाकी नहीं तो हारे को हरिनाम है। यह भाव आप किसी संस्था का हिस्सा बनकर हासिल कर लेते हैं या अपने दम पर लड़ते हुए नई प्रासंगिक संस्थाएं बनाकर।और भीऔर भी

मैं नहीं, तू सही। तू नहीं, कोई और सही। सांसारिक सुख तो मैं किसी भी नाम में, किसी भी शरीर में घुस कर हासिल कर सकता हूं। लेकिन अंदर का सुख मेरा अपना है जिसे मैं चाह कर भी बांट नहीं सकता।और भीऔर भी

लोगों को खुश करने के फेर में आप वो नहीं कर पाते जो आप में और आप जिसमें रचे-बसे हो। इसलिए वही करें जिसमें आपको आनंद आता है। दिल की बात सुननेवालों से कामयाबी भी ज्यादा दूर नहीं रह पाती।और भीऔर भी

जब तक आप इंद्रियों के जाल में फंसे हो, पुरुष स्त्री और स्त्री पुरुष को देखकर खिंचती है, खाने को देखकर लार टपकती है, तब तक आप बन रहे होते हैं, बड़े नहीं होते। वयस्क होने के बावजूद छोटे रहते हो।और भीऔर भी

क्लोन तो दोहराव है। उसमें सृजन कहां? जब प्रकृति के संसर्ग से नए से नया सृजन कर सकते हैं तो क्लोन पर मशक्कत क्यों? नियमों को समझकर प्रकृति के बीच रचने का आनंद प्रयोगशालों में नहीं मिलता।और भीऔर भी

जो चीज सालों से नहीं बदली, उसे बदलने का सुख ही सृजनात्कता का सुख है। बदलने की ललक हो, जीवट हो तो अंदर से ऊर्जा के बुलबुले उठते हैं। ये बुलबुले खुशी की चहक व ताजगी साथ लेकर आते हैं।और भीऔर भी