चुनावी माहौल में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की अप्रत्याशित सक्रियता की वजह क्या है? इसकी जांच गहराई से होनी चाहिए। पर, मुख्यधारा का मीडिया ऐसा करेगा नहीं, बिजनेस चैनलों व अखबारों की भी इसमें कोई रुचि नहीं होगी, सरकार ऐसा करेगी नहीं और पूंजी बाज़ार नियामक संस्था सेबी भी शायद इस झंझट में न पड़ना चाहे। ऐसे में शक का उठना लाज़िमी है कि कहीं भारतीय धन ही तो घूमकर वापस नहीं आ रहा। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार में अजब उलटबांसी चल रही है। अनिश्चितता से भरे माहौल में विदेशी निवेशक अमूमन धन निकाल लेते हैं। अर्थव्यवस्था कमज़ोर होने पर यह गति ज्यादा ही तेज़ हो जाती है। लेकिन जिन एफआईआई ने साल 2018 में अपने बाज़ार से 33,014 करोड़ रुपए निकाले और इस साल जनवरी में भी 4262 करोड़ निकाल डाले, उन्होंने 20 फरवरी के बाद से कल तक 41,904 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीद की है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

न्यूज़ चैनलों से लेकर तकरीबन सारा मीडिया एकस्वर से कह रहा है कि मोदी सरकार को भले ही कम बहुमत मिले, लेकिन वो दोबारा पांच साल के लिए सत्ता में आ रही है। मगर, बाज़ार न तो मीडिया की तरह बिका हुआ है और न ही वहां हवाबाज़ी ज्यादा चलती है। इसलिए वहां एक अंतर्धारणा यह भी ज़ोर मार रही है कि केंद्र में कांग्रेस के इर्दगिर्द महागठबंधन की सरकार बन सकती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

लोकसभा चुनावों का आगाज़ होने में आज को मिलाकर अट्ठारह दिन बाकी है। इन अट्ठारह दिनों में पक्ष-विपक्ष के दावों-प्रतिदावों की महाभारत जारी रहेगी। इस दौरान कुछ सनसनीखेज़ खुलासे भी हो सकते है। सात चरणों के मतदान के बाद नतीजे 23 मई को घोषित होंगे। लेकिन एक बात अच्छी तरह याद रखें कि कुछ दिनों के झंझावत के अलावा इन चुनावों का शेयर बाज़ार पर कोई खास असर नहीं होने जा रहा है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

जहां सब कुछ एकसाथ अलग-अलग दिशाओं में इतनी तेज़ी से बदल रहा हो, वहां हम पल-पल के भावावेश में फंसे रहे तो रिस्क लेने के बावजूद सही दांव कभी नहीं पकड़ सकते। इतने झंझावात के बीच अगर सही सूत्र पकड़ना है तो उसके लिए समता भाव को आत्मसात करना ज़रूरी है। न राग, न द्वेष। न दोस्ती, न दुश्मनी। जो जैसा है, उसे समभाव से वैसा ही देखने की अंतर्दृष्टि हासिल करनी पड़ेगी। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

इस दुनिया में कुछ भी अकारण नहीं होता। जो कुछ होता है, उसका कोई न कोई कारण ज़रूर होता है। शेयर बाजार में जहां तक यह नियम लगता है, वहां तक अध्ययन व अभ्यास से कार्य-कारण संबंध को जान-समझकर हम उस पर अपनी पकड़ बना सकते हैं। फिर भी शेयर बाज़ार में देश ही नहीं, ग्लोबल स्तर पर इतनी सारी शक्तियां एकसाथ काम कर रही होती हैं कि अनिश्चितता बराबर बनी रहती है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

रिस्क लेने की अपनी क्षमता समझ ली तो यह जानना होगा कि शेयर बाज़ार में कितना रिस्क है। कंपनी की बैलेंस शीट, उसका वित्तीय कामकाज, उसका प्रबंधन और उसकी शेयरधारिता के पैटर्न जैसी चीजों को हम पढ़कर थोड़ी मशक्कत से जान सकते हैं। लेकिन कब कौन उसके कितने शेयर खरीदने जा रहा है, अंदरखाने की ऐसी बातें हम नहीं जान सकते। इसके अलावा कुछ चीजें हम घटने से पहले जान ही नहीं सकते। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाने का सूत्र मूलतः रिस्क संभालने की कला में निहित है। लेकिन पहले रिस्क की सही-सही समझ ज़रूरी है। शुरुआत इस आकलन से करें कि आपके रिस्क लेने की क्षमता कितनी है। यह पूंजी के पैमाने से भिन्न है। मसलन, आप 1000 रुपए के दस, 100 रुपए के 100, दस रुपए के 1000 शेयर खरीदें तो पूंजी तो 10,000 रुपए ही लगती है, लेकिन रिस्क बढ़ता जाता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयरों के भावों के पैटर्न को परखते हुए उनके स्वभाव को भांपना, उनमें से अपने माफिक कंपनियां चुनना, दैनिक व साप्ताहिक चार्ट पर संस्थाओं व प्रोफेशनल ट्रेडरों की डिमांड व सप्लाई के बिंदुओं को जानना, खुद का सिस्टम बनाना और हर वक्त रिस्क को संभालने के अनुशासन का कड़ा पालन। ये पांच सूत्र साध लिए तो ट्रेडिंग में आपकी सफलता की प्रायिकता काफी ज्यादा बढ़ जाती है। इसमें रिस्क संभालना सबसे खास है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

शेयरों के भावों पर सबसे ज्यादा सटीक असर पड़ता है खबरों का। ये खबरें कंपनी के कामकाज, सरकारी नीति और किसी बड़े निवेशक या देशी-विदेशी संस्था द्वारा उसके शेयर खरीदने से संबंधित हो सकती हैं। दिक्कत यह है कि ये खबरें जब हम तक पहुंचती हैं, तब तक बाज़ार में उनका पूरा असर हो चुका होता है। रिटेल ट्रेडर कभी भी खबरों पर नहीं खेल सकता। भावों का पैटर्न ही उसका सहारा है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी