सहज-सी बात है कि लोगबाग जब बाज़ार में मौका देखते हैं, तभी अपना धन दांव पर लगाते हैं। गलती हो जाए तो इसका खामियाज़ा खुद भुगतते हैं और अपना दांव सुधार लेते हैं। इस तरह बराबर सीखते और खुद को दुरुस्त करते रहते हैं। लेकिन कुछ लोग चंद सौदों पर सारी ट्रेडिंग पूंजी लगा देते हैं और सीखने-समझने का आधार ही गंवा देते हैं। इस तरह के लोगों को कोई नहीं बचा सकता। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

हर बाजार की अपनी-अपनी खासियत होती है। दिल्ली के खारी बावली, चावड़ी बाज़ार चले जाइए या मुंबई के मंगलदास मार्केट। तेल से लेकर मेटल तक की थोक दुकानों में छोटी-छोटी गद्दियों पर बैठकर लोग करोड़ों का धंधा करते हैं। उन्हें अपने बाज़ार की रत्ती-रत्ती भर की खबर होती है। डिमांड व सप्लाई का अभी का ही नहीं, आगे का भी पूरा भान होता है। क्या आपको शेयर बाज़ार का इतना भान है? अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

देश जब अंग्रेज़ों का गुलाम था, व्यापार-धंधे पर तरह-तरह की बंदिशें लगी हुई थीं, तब भी यहां कुछ नहीं मिला तो लोगों ने शेयर बाज़ार का धंधा बरगद के पेड़ के नीचे ही बैठकर शुरू कर दिया। जी हां! आज के बीएसई की शुरुआत 142 साल पुरानी 1874 की है। यह बात दीगर है कि तब यह मुठ्ठीभर ब्रोकरों तक सीमित था। वहीं, आज इससे 3.17 करोड़ निवेशक जुड़े हुए हैं। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

भारत में बाज़ार की बेहद लंबी परंपरा रही है। जापान जहां चावल के धंधे का उस्ताद था, टेक्निकल एनालिसिस की कैंडलस्टिक करीब 270 साल पहले वहीं के राइस फ्यूचर्स से शुरू हुई थी; वहीं भारत मसालों से लेकर रुई तक के व्यापार का सरगना था। गुजरात में रुई के भाव खुलते थे और टेलिफोन जैसे साधन न होने के बावजूद चंद घंटों में सारे देश में वही भाव चलने लगते थे। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

देश आज़ादी के सत्तरवें साल में प्रवेश कर गया। अब तक के उनहत्तर सालों के अनुभव ने साफ कर दिया है कि हमने बाजार को जितना समझा और बाज़ार शक्तियों को जितना मुक्त किया है, बड़ों से लेकर छोटों तक के विकास के अवसर उतने ही ज्यादा खुले हैं। वहीं, सरकार ने जहां-जहां अपना अंकुश कसा है, वहां-वहां बंटाधार हुआ है। शिक्षा, स्वास्थ्य व सुरक्षा में सरकार की पक्की भूमिका है। बाकी नहीं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

केंद्र सरकार ने नई व्यवस्था यह की है कि अब ब्याज दरों का फैसला रिजर्व बैंक के गवर्नर नहीं, बल्कि छह सदस्यों की समिति करेगी जिसमें तीन सदस्य रिजर्व बैंक और तीन सरकार द्वारा मनोनीत अधिकारी होंगे। साथ ही सरकार ने अगले पांच साल के लिए मुद्रास्फीति को 4% तक बांधे रखने का लक्ष्य किया है। जाहिर है कि मुद्रास्फीति कम रखने के लिए ब्याज दर बढ़ाने की कसरत की जाती रहेगी। अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बाज़ार में किसी दूसरी चीज़ की तरह पूंजी के दाम का फैसला भी मांग और आपूर्ति के संतुलन से होना चाहिए। मांग ज्यादा, आपूर्ति कम तो ब्याज दर बढ़े। मांग कम तो ब्याज घटे। लेकिन दुनिया भर के केंद्रीय बैंक इस मामले में खुल्लमखुल्ला धांधागर्दी चला रहे हैं। अमेरिका ने नोट छापकर सिस्टम में डालने का काम 2008 में शुरू किया। 2009 में यूरोप और 2010 में जापान ने ऐसा किया। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

आज सब कुछ बाज़ार के हवाले है तो माना जाता है कि सरकार नहीं, बल्कि बाज़ार को ही सारे आर्थिक संतुलन का फैसला करने देना चाहिए। चीन समाजवादी देश है तो वहां सरकार का वर्चस्व समझ में आता है। लेकिन बाज़ार अर्थव्यवस्था में गहरा यकीन रखनेवाले अमेरिका, यूरोप व जापान जैसे देशों में पूंजी के दाम या ब्याज दर का फैसला आखिर सरकार की तरफ से वहां के केंद्रीय बैंक क्यों करते हैं? अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

आज रिजर्व बैंक चालू वित्त वर्ष 2016-17 की हर दो महीने पर होनेवाली तीसरी मौद्रिक नीति समीक्षा पेश करने जा रहा है। हमेशा की तरह बाज़ार खुलने के लगभग डेढ़ घंटे बाद इसे रिजर्व बैंक की वेबसाइट पर 11 बजे घोषित किया जाएगा। यह गवर्नर रघुराम राजन के कार्यकाल की आखिरी मौद्रिक नीति समीक्षा होगी और माना जा रहा है कि वे ब्याज या रेपो दर को 6.50% पर यथावत रखेंगे। अब समझते हैं मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

यूं तो इंसान के लालच की कोई सीमा नहीं। फिर भी अधिक से अधिक रिटर्न तो सभी कमाना चाहते हैं। हालांकि इस अधिक से अधिक की भी सीमा हमें समझनी चाहिए। अच्छी तरह समझें कि यह सीमा अलग-अलग देश की अर्थव्यस्था और वहां चल रही ब्याज दर पर निर्भर करती है। मसलन, अमेरिका में ब्याज दर 0.25 से 0.50% सालाना है तो वहां वित्तीय बाज़ार से 2-3% कमाई बहुत होती है। अब देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी