शेयरों में निवेश के पांच बुनियादी नियम हैं। कंपनी को खुद ठोंक-बजाकर देखने के बाद ही निवेश करें। ऐसी ही कंपनी चुनें जो अपने धंधे और लाभप्रदता को लम्बे समय तक बनाए रख सके। ऐसी दमखम वाली कंपनी के भी शेयर तभी खरीदें, जब वे कम भाव में मिल रहे हों क्योंकि ज्यादा भाव में खरीदा तो अच्छा रिटर्न नहीं मिल सकता। निवेश हमेशा लम्बे समय के लिए करें क्योंकि छोटी अवधि की ट्रेडिंग अक्सर घाटे काऔरऔर भी

भारतीय कृषि मानसून पर बहुत ज्यादा निर्भर है। मानसून में हुई शुरुआती देरी से खरीफ की फसलों की बोवाई लगभग 5% घट गई है। कृषि मंत्रालय के मुताबिक 23 जून तक देश में 129.52 लाख हेक्टेयर में बोवाई हुई है, जबकि पिछले साल यह रकबा 135.64 लाख हेक्टेयर का था। महाराष्ट्र में कपास का रकबा घटने की खबरें आ रही हैं। अल निनो का नकारात्मक असर धान, गन्ना, मोटे अनाज व दालों तक पर पड़ना तय है।औरऔर भी

बड़ी-बड़ी बातें करने या लम्बी फेंकनेवाला यकीनन शेयर बाजार के निवेश में सफल नहीं होता। यहां वही सफल होता है जो जानता है कि वह शेयरों के भाव को प्रभावित करनेवाले सभी कारकों को नहीं जान सकता। दूसरे, वह यह भी जानता है कि जिस कंपनी में वो निवेश करने जा रहा है, उसका धंधा क्या है, उसमें कितना दम व संभावना है और कंपनी प्रबंधन ने अब तक इस धंधे में कितनी धाक जमायी है। बिजनेसऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग भी एक तरह का निवेश है और निवेश भी एक तरह की ट्रेडिंग। निवेश का मकसद भी अंततः मुनाफा कमाना होता है तो वह भी लम्बे समय की ट्रेडिंग है और ट्रेडिंग छोटे समय का निवेश। ट्रेडिंग में अब तक की सफलतम रणनीति है मोमेंटम ट्रेडिंग। जो स्टॉक्स लगातार बढ़ रहे हैं और बढ़ते ही जा रहे हैं, उन्हें हर डुबकी पर खरीद लेना काफी लाभ का सौदा होता हैं। अब तो निवेशऔरऔर भी

देश की अर्थव्यवस्था या जीडीपी बढ़ता है तो शेयर बाज़ार बढ़ता है। लेकिन ऐसा तुरत-फुरत नहीं होता। दोनों का रिश्ता सीधा नहीं, समय सापेक्ष है। कारण, जहां जीडीपी अतीत को दर्शाता है, वहीं शेयर बाज़ार भविष्य को सोचकर चलता है। भारत भले ही दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन अंदर से इसकी हालत अच्छी नहीं है। फिर भी शेयर बाज़ार बढ़ रहा है क्योंकि भारत का भविष्य संभावनाओं से भरा हुआ है। भारत से बड़ीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से कमा पाना यकीनन मुश्किल है। लेकिन ट्रेडिंग के लिए स्टॉक्स चुनना आसान है। आम रिटेल ट्रेडर के माफिक वही स्टॉक्स होते हैं जिनमें लॉन्ग टर्म, मीडियम टर्म व शॉर्ट टर्म रुख बढ़ने का है। कोई स्टॉक 52 हफ्ते के शिखर के करीब हो या वहां पहुंच गया हो, तब भी उसे ट्रेड के लिए चुन सकते हैं। लेकिन लम्बे निवेश में हमें मूल्यवान शेयर को कम से कम भाव पर पकड़ना होताऔरऔर भी

शेयर बाज़ार जितना ही पारदर्शी, शेयरों के भावों की खोज उतनी ही सटीक। बाज़ार को पारदर्शी बनाना सरकार और पूंजी बाज़ार की नियामक संस्था, सेबी का दायित्व है, हमारा नहीं। हम जैसे आम निवेशक यहां आंदोलन करने नहीं आए। हमें तो कायदे के निवेश से काम भर का मुनाफा कमाकर संकरी गली से निकल लेना है। फिर भी सवाल तो उठता ही है कि तीन साल में अडाणी ग्रीन का शेयर 5000% से ज्यादा बढ़कर 55 सेऔरऔर भी

बहुत सोच-समझकर, आग-पीछा देखकर कंपनी चुनकर उसके शेयर खरीदे। फिर भी उसका शेयर बढ़ने के बजाय घाटा दे सकता है। यह शेयर बाजार का रिस्क है जिससे कोई नहीं बच सकता। इसलिए निवेशकों को एक नहीं, कई तरह की कंपनियों में निवेश करने को कहा जाता है। फिर भी कुछ ज़रूरी पहलू है जिन्हें हमें निवेश से पहले हर कंपनी में देख लेना चाहिए। पहला, कंपनी कहीं ऋण के बोझ तले दबी तो नहीं है। उसका ऋण-इक्विटीऔरऔर भी

शेयर का भाव देखकर नहीं पता चलता कि वह सस्ता है या महंगा। 5 रुपए का भी कोई शेयर महंगा हो सकता है और 5000 रुपए का शेयर भी सस्ता। शेयर महंगा है या सस्ता, इसका सबसे प्रचलित पैमाना है पी/ई अनुपात, मतलब शेयर का भाव कंपनी के प्रति शेयर लाभ (ईपीएस) से कितना गुना चल रहा है या बाज़ार कंपनी के प्रति शेयर एक रुपए के लाभ के लिए कितना दाम देने को तैयार है। दूसराऔरऔर भी

एक बात हमें अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि हम कितनी भी मशक्कत कर लें, निवेश में सफलता रातोंरात नहीं मिलती। इसके लिए समय, अनुशासन व धैर्य की दरकार होती है। अगर आपको लगता है कि शेयर बाज़ार से खटाखट नोट कमाने का कोई फॉर्मूला है तो यह विचार फौरन जेहन से निकालकर दूर फेंक दें। साथ ही हमें निवेश और सट्टेबाज़ी के अंतर को साफ समझ लेना चाहिए। शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग एक तरह का सट्टाऔरऔर भी