विवेक और स्मृति
विवेक तर्क की स्वाभाविक परिणति है, स्मृति विवेकयुक्त साधना और एकात्मता साधनायुक्त स्मृति की। तर्क विवेक तक ले जाता है। स्मृति अपने उत्स की ओर लौटना है। एकात्मता की अवस्था में तो जीने-मरने जैसे द्वैतभाव ही मिट जाते हैं।और भीऔर भी
बुद्धि के बिना
बुद्धि के बिना हम क्षितिज के पार नहीं देख सकते। इसीलिए हमारी याददाश्त भी बड़ी कमजोर होती है। इसका फायदा दुष्ट लोग उठाते हैं। वे बार-बार संत का भेष बनाकर आते हैं और हमें लूटकर चले जाते हैं।और भीऔर भी
मुक्तिबोध की अंत्येष्टि से हुसैन नंगे पैर!
नहीं पता कि मकबूल फिदा हुसैन झूठ बोलते थे या बुढ़ापे में उनकी याददाश्त कमजोर पड़ गई थी। दिसबंर 2006 में एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि नंगे पांव रहना उन्होंने 1964 में मशहूर कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की अंत्येष्टि के दिन से शुरू किया था। दिल्ली में अंतिम दर्शन के दौरान उन्हें यह जानकर सदमा लगा कि तब तक इतने महान कवि की एक भी रचना नहीं छपी थी। इस दुख में उन्होंने अपने जूतेऔरऔर भी
पोटली का छलावा
याददाश्त जितनी छोटी होती जाती है, हमारे अहसास उतने लंबे होते चले जाते हैं। हमारे लिए हमारा पूरा जीवन उसी छोटी पोटली में सिमट जाता है। लगता ही नहीं कि इसके अलावा भी हमने कुछ और देखा-परखा है।और भीऔर भी
यादें, नींद और जीवन
जब तक जगे रहे, ज़िंदा रहे। सो गए तो मर गए। फिर जगे तो नया जीवन। ज़िदगी को यूं जागने-सोने के चक्र में बांटना अच्छा लगता है। लेकिन हो कहां पाता है क्योंकि कोशिकाओं तक की अपनी यादें होती हैं।और भीऔर भी





