भीड़भाड़ वाली सड़क पर अगर पांच सौ का नोट गिरा पड़ा हो तो सावधान हो जाइए क्योंकि हो सकता है कि कुछ लोग आपको छकाने की मस्ती कर रहे हों। इसी तरह ट्रेडिंग में आसानी से नोट नहीं बनते। देशी-विदेशी दिग्गज यहां मैदान में डटे हैं। उनके बीच उतरकर नोट कमाना शेर के जबड़े से शिकार खींचने जैसी बहादुरी है। लेकिन ट्रेडिंग में बहादुरी नहीं, समझदारी चलती है जो अभ्यास से आती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग चुटकी बजाकर अमीर बनाने का धंधा नहीं है। यहां सरकारी बांडों या बैंकों की एफडी जैसी सुरक्षा नहीं है। यहां तो दीर्घकालिक निवेश जैसी निश्चिंतता भी नहीं है। यह एक तरह का बिजनेस है। टैक्स के लिहाज से भी इसे बिजनेस ही माना गया है और इससे हुई आय पर उसी हिसाब से टैक्स लगता है। शेयरों की ट्रेडिंग में उतरनेवालों को यह बुनियादी बात हमेशा याद रखनी चाहिए। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अमेरिका ही नहीं, यूरोप व जापान तक में नोट छापकर बाज़ार में डालने का सिलसिला चला हुआ है। ब्याज दर लगभग शून्य है। ऐसे उधार पर 2-4% सालाना रिटर्न भी मिल जाए तो निवेशकों की मौज। इसी बेहद सस्ते धन के दम पर दुनिया भर के बाज़ार चढ़े हुए हैं। सालोंसाल से अमेरिकी कंपनियों का धंधा और मुनाफा ठहरा हुआ है। फिर भी डाउ जोन्स सूचकांक ऐतिहासिक चोटी तक चला गया। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

शेयर बाज़ार का मकसद बड़ा सीधा-सरल है। वो लोगों की उस पूंजी को खींचने का माध्यम है जिसे उद्योग-धंधों में लगाने का रिस्क लिया जा सकता है। लेकिन आज लोगों को इसमें कोई उद्योग नहीं, बल्कि नोट कमाने का धंधा भर दिखता है। यह लालच व डर की भावना का भुनाने का ज़रिया बन गया है। शेयरों के भाव कंपनी की ताकत पर नहीं, बल्कि सस्ते धन के आगम पर चढ़े हुए हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ऋण देना समझ में आता है। लेकिन ऋण भी बिकने लग जाए तो माथा घूम जाता है। बैंक जो ऋण वसूल नहीं पाते, उसे दूसरे के माथे मढ़ देते हैं। उसे लेनेवाला इसे बोझ नहीं, बल्कि धंधा समझता है। तमाम एसेट रीक्रंस्ट्रक्शन कंपनियां बन चुकी हैं। सीडीओ, सीडीएस जैसे न जाने कितने प्रपत्र बन चुके हैं। यह अलग बात है कि इन्हीं के चक्कर में 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट पैदा हुआ था। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बैंक वित्तीय बाज़ार की पहली कड़ी हैं। लोगों को बचत की सुविधा और थोड़ा ब्याज देना। फिर वो बचत उद्योग व ज़रूरतमंद लोगों को ज्यादा ब्याज पर देकर कमाना। लेकिन बैंक आज इस सरल धंधे से बहुत आगे निकल चुके हैं। निवेश बैंकिंग उनका बड़ा धंधा बन चुका है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बैंकों के ट्रेजरी विभाग में काम करनेवालों की तनख्वाह औरों से तीन गुना तक ज्यादा होती है। अब पकड़ते हैं मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

जब भी हम किसी माध्यम से कमाने की सोचते हैं तो उसका मूल हमें पता होना चाहिए। अन्यथा, हम छायाओं से ही खेलते रह जाएंगे। हम सभी वित्तीय बाज़ार, खासकर शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग से कमाना चाहते हैं। आज वित्तीय बाज़ार में बिचौलियों की न जाने कितनी परतें घुस गई हैं। लेकिन मूलतः इसका मकसद था कि बचत करनेवाले को उसका उपयोग करनेवालों से ऐसे जोड़ा जाए कि दोनों का फायदा हो। अब देखें सोम का व्योम…औरऔर भी

उद्यमी रिस्क ही रिस्क लेता है। स्टार्ट-अप वाले भी जुगाड़ टाइप रिस्क ही लेते हैं। आईआईएम या आईएमएम वाले सुरक्षित रिस्क लेते हैं। समझने की बात है कि ट्रेडर न तो उद्यमी है, न ही स्टार्ट-अप या फाइनेंस का मास्टर। उसका ट्रेड ऐसा है जिसमें बाज़ी बड़े बारीक अंतर से इधर से उधर चली जाती है। इसलिए उसे हिसाब लगाना पड़ता है कि इतना हारे, उतना जीते तो फायदे के लिए सौदे में रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात कितना होनाऔरऔर भी

ट्रेडरों का रिस्क प्रोफाइल भिन्न होता है तो उनकी ट्रेडिंग रणनीति भी अलग होती है। जो लोग कम रिस्क लेना चाहते हैं उन्हें तिमाही नतीजों की घोषणा के आसपास कंपनी के शेयरों को हाथ नहीं लगाना चाहिए। नतीजों के 15-20 दिन बाद जब मारकाट मिट जाए, मामला शांत हो जाए, तभी उसकी तरफ झांकना चाहिए। वैसे, कुछ भी कर लो ट्रेडिंग से रिस्क खत्म नहीं हो सकता। इसलिए हिसाब से चलें। अब करते हैं शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

हर खेल हर खिलाड़ी के लिए नहीं होता। वहीं, हर बॉल पीटने के चक्कर में बल्लेबाज़ खुद पिट जाता है। लंबी पारी खेलने में माहिर धुरंधर बहुत-सी गेंदों को जाने देते हैं। वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में भी अगर आपको लंबी पारी खेलनी है, बराबर कमाना है तो बहुत सारे अवसरों पर आपको ट्रेडिंग से दूर रहना चाहिए। मसलन, आज डेरिवेटिव सौदों की एक्सपायरी के दिन बाज़ार से दूर रहने में भलाई है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी