शेयर बाज़ार में ट्रेड करते वक्त युद्धरत दो सेनाओं को बराबर याद रखें। कमाल यह है कि दोनों ही सेनापतियों के मुख्य हथियार ऐसे मिडकैप और लार्जकैप स्टॉक्स बनते हैं जिन्हें सूचकांकों या खासकर सेंसेक्स व निफ्टी में जगह मिली हुई है। हालांकि स्मॉल-कैप भी उनका ज़रिया बनते हैं। लेकिन बाज़ार की दशा-दिशा में ज्यादा भूमिका न होने के कारण इनको खास तवज्जो नहीं मिलती। हां, ये भगदड़ के शिकार ज़रूर बनते हैं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में वही ट्रेडर सफल होता है जो सैनिकों जैसे दृढ़ अनुशासन का पालन करता है। एकदम सर्जिकल स्ट्राइक जैसा उसका तरीका होता है। सटीक निशाना चुनकर सही वक्त पर हमला करना और योजना के अनुसार काम पूरा होने पर बाहर निकल लेना। दुर्भाग्य से ज्यादातर ट्रेडर बाज़ार में अनुशासन के बजाय थ्रिल व मौज के लिए सौदे करते हैं। समझते भी नहीं कि गलती कहां की। अंततः भारी नुकसान उठाते हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में चल रहे युद्ध में ट्रेडर को शक्ति-संतुलन की बारीक परख के साथ योजना बनाकर उतरना पड़ता है। अन्यथा उसे दो खेमों के बीच में पिसते देर नहीं लगती। सफल ट्रेडर बाज़ार की हर हरकत पर उछलता-गिरता नहीं, बल्कि पूरा धीरज बरतते हुए हिसाब लगाता है, स्टॉक्स चुनता है और गिनता है कि उनके बढ़ने या गिरने की प्रायिकता कितनी है। फिर अपने रिस्क को तौलकर दांव लगाता है। अब लगाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार, दरअसल दो सेनाओं के युद्ध जैसा है। एक सेना भावों को बराबर उठाते जाना चाहती है, जबकि दूसरी सेना भावों को बराबर नीचे ले जाने में लगी रहती है। दोनों में बराबर युद्ध चलता रहता है। कभी एक का पलड़ा भारी तो कभी दूसरे का। कभी-कभी मामला बीच में अटका रहता है। ट्रेडर का कोई खेमा नहीं होता। उसे बाज़ार के संतुलन के हिसाब से कमाने की कला सीखनी पड़ती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

सूचकांक भले ही नई ऊंचाइयां छूते जा रहे हों। लेकिन पूरे शेयर बाज़ार में जहां हर दिन कुछ शेयर 52 हफ्ते का उच्चतम स्तर बना लेते हैं, वहीं कुछ शेयर न्यूनतम स्तर पकड़ लेते हैं। मसलन, बीते शुक्रवार को एनएसई में जहां 92 शेयर शिखर पर पहुंच गए, वहीं 40 शेयर साल भर के न्यूनतम स्तर तक जा गिरे। हमें ट्रेडिंग करते हुए इन उठते-गिरते शेयरों पर बारीक नज़र रखनी चाहिए। अब परखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार के आगे अमेरिका या ब्रिटेन की राजनीतिक अनिश्चितता के साथ-साथ घरेलू अस्थिरता का भी रिस्क आ खड़ा हुआ है। आर्थिक रिस्क पहले ही चौथी तिमाही में जीडीपी के कमज़ोर आंकड़ों के रूप में झलक दिखला चुका है। पहली जुलाई से देश भर में जीएसटी लागू होने जा रहा है। व्यापारी तबका इसको लेकर बहुत परेशान है। कहीं यह ‘आसान’ टैक्स महीनों तक सब कुछ जाम न कर दे। अब करते हैं शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

देश में हर महीने कम से कम 10 लाख नौजवान रोज़गार की लाइन में लग जाते हैं, यानी साल भर में करीब डेढ़ करोड़। नौजवानों की बढ़ती तादात को अर्थव्यवस्था के लिए वरदान माना जाता रहा है। लेकिन उन्हें काम-धंधे या नौकरियों में नहीं खपाया जा सका तो इस वरदान को अभिशाप बनते देर नहीं लगेगी। यह मोदी सरकार के लिए बेहद गंभीर चुनौती है। इसे जुबानी जमाखर्च से नहीं निपटा जा सकता। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

पिछले दिनों जिस तरह महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश के बाद देश के तमाम राज्यों में किसान आंदोलन भड़क गया, उसे देखते हुए फिलहाल राजनीतिक रिस्क बहुत ज्यादा बढ़ गया लगता है। मालूम हो कि खेती-किसानी ने शिव की जटा की तरह असंतोष की उफनती गंगा को समेटकर रखा हुआ है। करोड़ों बेरोज़गार गांवों में खेती से जबरन चिपके हुए हैं। अगर एक बार वे वहां से छिटके तो उन्हें संभालना मुश्किल हो जाएगा। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

ज़मीन पर चलनेवाले को फिसलने का डर रहता है, खाईं में गिरने का डर नहीं रहता। लेकिन चोटी पर चढ़ा हुआ शख्स ज़रा-सा फिसला तो गहरी घाटी में गिर सकता है। साल 2008 में ऐसा हो चुका है। तब भी बहुत सारे आईपीओ आ रहे थे। बाज़ार के नए आसमान पर चढ़ने की बात की जा रही थी। लेकिन अचानक गिरा तो वह खजूर पर नहीं अटका, बल्कि सीधे रसातल जा पहुंचा। अब आजमाएं मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में उन्माद-सा छाया हुआ है। जबरदस्त आशावाद। कोई कहता है, निफ्टी अगले एक-डेढ़ साल में 2000 अंक बढ़ जाएगा और तीन साल में 13,000 तक पहुंच सकता है। इसी तरह साल भर के भीतर सेंसेक्स के 54,000 तक उठने की बात की जा रही है। ऐसे में निवेशकों ही नहीं, बहती धारा के साथ बहनेवाले ट्रेडरों को भी बेहद सावधान रहने की ज़रूरत है। वरना, अचानक डूब गए तो! अब परखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी