साल भर पहले एनएसई में शेयरों में हो रही ट्रेडिंग में रिटेल निवेशकों का हिस्सा 38% हुआ करता था। इधर नए निवेशकों के जुड़ने पर इसमें शायद इजाफा हो गया होगा। मुश्किल यह है कि नए आगंतुक समझदारी या विश्लेषण से मूल्य की तलाश में निकले दीर्घकालिक निवेशक नहीं, बल्कि डे-ट्रेडिंग, मार्जिन ट्रेडिंग और फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस में खेलनेवाले 25-30 या 35 साल तक के लोग हैं जिन्हें गेमिंग मे मज़ा आता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

रिजर्व बैंक गर्वनर के बयान से महीने भर पहले पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी के चेयरमैन अजय त्यागी ने एक सम्मेलन में बताया था कि देश में नए डीमैट खातों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। लॉकडाउन के बाद दस लाख से ज्यादा डीमैट खाते खुले हैं और ये सभी आईपीओ या नई लिस्ट होनेवाली कंपनियों में नहीं, बल्कि शेयर बाज़ार में पहले से लिस्ट कंपनियों में निवेश/ट्रेडिंग करने को आतुर हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार पर भले ही सेबी का नियमन चले, वो स्टॉक एक्सचेंजों के नियमों के अधीन काम करे, लेकिन उसकी चाल पर न तो सरकार का कोई नियंत्रण है और न ही रिजर्व बैंक का। रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास तक मानते हैं कि शेयर बाज़ार की तेज़ी और अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति में कोई रिश्ता नहीं। भारत ही नहीं, दुनिया भर में अतिरिक्त धन का प्रवाह बाज़ार को चढ़ाए हुए है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

वित्तीय पूंजी की घातक फांस से दुनिया को निकालना ज़रूरी है। भारत चाहे तो इस दिशा में सार्थक पहल कर सकता है। वह अनुत्पादक वित्तीय पूंजी के जाल को काट उत्पादक पूंजी व उत्पादन के साधनों को बढ़ावा दे सकता है। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ाकर रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकता है। लेकिन दिक्कत यह है कि मौजूदा सरकार ने हमारी बचत पर झपट्टा मारकर हमें खोखले नारों में उलझा रखा है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

यह उधार की दुनिया है। बेहद सस्ता उधार लेकर ग्लोबल पूंजी मुनाफे के माध्मय तलाशती हर तरफ सूंघती फिर रही है। व्यापार और पूंजी के प्रवाह में असंतुलन आ गया है। अर्थव्यवस्था का वित्तीयकरण हो चुका है। कोई सवाल नहीं उठते क्योंकि इससे सम्पन्नता व समृद्धि आ रही है। लेकिन वित्तीय पूंजी का यह दबदबा कितना घातक है, यह 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट दिखा चुका है। तभी से लीपापोती चल रही है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

प्राइस डिस्कवरी में शेयर बाज़ार की भूमिका किसी एक कंपनी या उद्यम के बारे में सही हो सकती है। मसलन, रिलायंस ने कोरोना संकट के बावजूद जियो प्लेटफॉर्म के लिए 1.52 लाख करोड़ रुपए जुटा डाले। लेकिन शेयर बाज़ार अर्थव्यवस्था का मूल्य खोजने का साधन नहीं रह गया है। कारण यह है कि बोली लगानेवाला धन अब देशी ही नहीं रहा, बल्कि इसमें कहीं ज्यादा बड़ी भूमिका विदेशी धन की हो गई है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अमेरिका के बारे में कह सकते हैं कि वहां 3 नवंबर को राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। वहां सालों-साल का इतिहास रहा है कि राष्ट्रपति चुनाव आने तक शेयर बाज़ार को चढ़ाया जाता है। इसलिए शेयर बाज़ार को ज्यादा भाव मिल रहा है। लेकिन जापान के निक्केई सूचकांक का पी/ई अनुपात क्यों चढ़ा हुआ है? वहीं, चीन का शांघाई सूचकांक दबा हुआ है, जबकि वह कोरोना पर काफी हद तक नियंत्रण कर चुका है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

कहते हैं कि शेयर बाज़ार उद्यमों का मूल्य खोजने या प्राइस डिस्कवरी का माध्यम हैं। अर्थव्यवस्था की अंदरूनी क्षमता भी यह दिखाता है। पर यह वाकई कैसे होता है, यह कतई साफ नहीं। जैसे, अमेरिका का डाउ जोन्स सूचकांक व S&P-500 सूचकांक का पी/ई अनुपात साल भर में बढ़कर क्रमशः 18.60 से 28.26 और 21.92 से 35.39 हो गया, जबकि वहां की आर्थिक स्थिति खराब चल रही है और भविष्य भी डांवाडोल है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

हम रिटेल ट्रेडर हैं। सीमित धन, समझ व संसाधन। मगर असीमित हौसला लेकर बाज़ार में उतरते हैं। यह असीमित हौसला या रिस्क लेना तभी काम आता है, जब हम सच को आधार बनाते हैं। बाज़ार का सच यह है कि यहां शत-प्रतिशत थोक व्यापारी कमाते हैं, जबकि 95% रिटेल ट्रेडर गंवाते हैं। बाकी 5% ट्रेडर इसलिए कमाते हैं क्योंकि थोक व्यापारियो की तरह थोक भाव पर खरीदते और रिटेल भाव पर बेचते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

कहते हैं कि शेयर बाज़ार उद्यमों/कंपनियों की ‘प्राइस डिस्कवरी’ या ‘मूल्य निर्धारण’ का माध्यम है। जाहिर है कि ‘मूल्य निर्धारण’ वही कर सकता है जिसके पास भरपूर धन हो। क्या हम-आप कभी आईपीएल के खिलाड़ियों की बोली लगा सकते हैं? इसलिए शेयर बाज़ार में उतरते वक्त हमें हमेशा अपनी औकात याद रखनी चाहिए। नहीं तो इस नदी में हम मछलियों की तरह किसी न किसी उस्ताद में कांटे में फंस जान गवां बैठेंगे। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी