स्वाभाविक है
पहले दुनिया सिमटी हुई थी। इर्दगिर्द खास कुछ नहीं बदलता था तो लोग सुबह-सुबह नहा-धोकर एकाध घंटे पूजापाठ करते थे। अपने अंदर झांकते थे। अब दुनिया बढ़ते-बढ़ते ग्लोबल हो गई है तो एकाध घंटे अखबारों के जरिए बाहर झांकना जरूरी हो गया है।और भीऔर भी
सीमित अपने तक
भगवान पर ध्यान लगा हम अपने अंदर की शक्तियों और बाहर की ताकतों को साधते हैं। भगवान यहीं तक सीमित रहे तो बड़ा कल्याणकारी है। लेकिन, कोई जब दूसरों को खींचने के लिए भगवान का इस्तेमाल करने लगता है तो वह बड़ा विनाशकारी हो जाता है।और भीऔर भी
हम सभी निर्वासित
मौजूदा समाज की सबसे बड़ी खामी यह है कि वो व्यक्ति की अंतर्निहित क्षमता के संपूर्ण विकास का मौका नहीं देता। गुजर-बसर के लिए न चाहते हुए भी क्या से क्या करना पड़ता है! तभी तो यहां मुठ्ठी भर को छोड़कर ज्यादातर लोग निर्वासित हैं।और भीऔर भी
हमदर्द दोस्त
घर-परिवार से लेकर काम-धंधे तक स्वार्थों की दुनिया फैली है। इनमें कुछ गिने-चुने लोग ही होते हैं जो आपकी परवाह करते हैं। ऐसे हमदर्द दोस्त बड़े नसीब वालों को ही मिलते हैं। इसलिए इनकी कद्र जरूरी है।और भीऔर भी






