भारत में दस लाख डॉलर (8.2 करोड़ रुपए) से ज्यादा की दौलतवाले करीब 3,44,600 एचएनआई (हाई नेटवर्थ इंडीविजुअल्स) हैं। इनमें से दस करोड़ डॉलर (820 करोड़ रुपए) से ज्यादा की दौलतवाले 1078 और एक अरब डॉलर (8200 करोड़ रुपए) से ज्यादा की दौलतवाले 123 लोग हैं। देश छोड़कर बाहर बसने की वजह राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक हो सकती है। हेनली एंड पार्टनर्स के सीईओ युर्ग स्टेफन का कहना है कि राजनीतिक स्थिरता, कम टैक्स और निजी स्वतंत्रताऔरऔर भी

देश छोड़कर परदेशी बनते भारतीयों में रोज़ी-रोजगार के चक्कर में खाड़ी देशों से लेकर कनाडा तक बसनेवाले गरीब ही नहीं, बल्कि करोड़पति व अरबपति तक शामिल हैं और यह सिलसिला कहीं थमता नहीं दिख रहा। जून में आई हेनली प्राइवेट वेल्थ माइग्रेशन रिपोर्ट 2023 के मुताबिक इस साल भारत से 6500 ऐसे हाई नेटवर्थ व्यक्ति (एचएनआई) विदेश जाकर बसने की तैयारी में हैं जिनकी दौलत दस लाख डॉलर (8.2 करोड़ रुपए) से ज्यादा है। पिछले साल 2022औरऔर भी

कुत्ता पीछे पड़ जाए तो भागते-भागते दम निकल जाता है और धन पीछे पड़ जाए तो शेयर बाज़ार कुलांचे मारने लगता है। अपने शेयर बाज़ार का यही हाल है। विदेशी धन के पीछे पड़ने से बाज़ार नए ऐतिहासिक शिखर पर जा पहुंचा है। अकेले दो दिन में ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने अपने शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट में करीब 18,750 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीद की है। जून महीने में उन्होंने इक्विटी में कुल 47,148औरऔर भी

भारत में पिछले सौ सालों में 18 साल सूखे के रहे हैं। इनमें से 13 सालों का वास्ता अन निनो से रहा है। साल 1900 से 1950 के बीच सात साल ही अन निनो आया था। लेकिन साल 1951 से 2021 के दौरान 15 साल अन निनो की गिरफ्त में रहे। इनमें से मानसून के नौ सीजन में औसत से 90% या कम बारिश हुई थी और सूखे के हालात बन गए थे। सबसे ताज़ा सूखा सालऔरऔर भी

अमेरिका के राष्ट्रीय सामुद्रिक व वायुमंडलीय प्रशासन (एनओएए) ने घोषित कर दिया है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर पर अल निनो की तगड़ी पकड़ बन चुकी है। अल निनो एक स्पेनिश शब्द है जिसका मतलब होता है छोटा बच्चा। लेकिन इसके तहत भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुदी सतह का पानी असामान्य रूप से गरम हो जाता है जिससे दुनिया के मौसम पर बड़ा असर पड़ता है। इससे दुनिया के कई इलाकों में अतिवृष्टि और कई इलाकों में सूखेऔरऔर भी

इस बार मौसम का हाल अच्छा नहीं चल रहा। केरल में मानसून का आगाज़ आठ दिन देर से हुआ। मुंबई में समान्य से दो हफ्ते बाद अब जाकर बारिश आई है। समूचे महाराष्ट्र के बारे में मौसम विभाग का कहना है कि अभी तक 88% कम बारिश हुई है। वैसे तो ओडिशा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों तक मानसून पहुंच चुका है। असम में उफनतीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाने का हुनर कोई दूसरा हमें कभी नहीं सिखा सकता। यहां तो मर-खपकर हमें खुद ही एकलव्य बनना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय अनुभव की कोई कमी नहीं। अलेक्जैंडर एल्डर ने ‘ट्रेडिंग फॉर लिविंग’ पर दो किताबें बेहद ईमानदारी व मेहनत से अपने निजी अनुभव के आधार पर लिखी हैं। इन्हें पढ़कर भारतीय परिस्थिति और अपनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए खुद का ट्रेडिंग सिस्टम विकसित कर सकते हैं। यह काम एक दिनऔरऔर भी

आज फाइनेंस की दुनिया ग्लोबल हो चुकी है। अमेरिका व यूरोप से शुरू होकर धन का प्रवाह ऑस्ट्रेलिया और एशिया के प्रमुख शेयर बाज़ारों से होते हुए भारत तक पहुंचता है। हमारा बाज़ार सुबह 9.15 बजे खुलता है। उसके 40-45 मिनट पहले वैश्विक बाज़ारों का उस दिन का ट्रेन्ड साफ हो चुका है। इसमें भी अगर हम 8.30 बजे सुबह तक सिंगापुर स्टॉक एक्सचेंज की वेबसाइट पर सिंगापुर निफ्टी-50 का हाल देख लें तो अंदाज़ लग जाताऔरऔर भी

रिटेल ट्रेडर को हमेशा बाज़ार के रुख के साथ चलना चाहिए। बाज़ार का रुख कभी-कभी म्यूचुअल फंड और बीमा कंपनियों जैसे देशी संस्थागत निवेशक (डीआईआई) भी तय करते हैं। लेकिन ज्यादातर उसका फैसला विदेशी पोर्टफोलियो या संस्थागत निवेशक (एफपीआई या एफआईआई) ही करते हैं। डेरिवेटिव बाज़ार तो विदेशी निवेशकों के लिए महज हेजिंग का जरिया है। वे अपनी असली कमाई करते हैं शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट से। इसमें अगर उनकी शुद्ध खरीद जारी है और प्रतिदिनऔरऔर भी

अगर आप सोशल मीडिया पर ऑनलाइन या ऑफलाइन स्टॉक ट्रेडिंग सिखानेवालों के फंदे में फंस गए तो बहुत सारे जार्गन या जुमले ज़रूर सीख जाएंगे। लेकिन ट्रेडिंग के सार और अपने रिफ्लेक्सेज़ को कभी नहीं साध पाएंगे। ट्रेडिंग का सार यह है कि सारा खेल भावों के उतार-चढ़ाव का है और शेयरों के भाव धन के आगम और निकास से निर्धारित होते हैं। धन का प्रवाह धनात्मक है, खरीदनेवालों की दिलचस्पी ज्यादा और बेचनेवालों की कम हैऔरऔर भी