लम्बे निवेश का फंडा एकदम अलग है और ट्रेडिंग का एकदम अलग। ट्रेडिंग में कंपनी के ईपीएस, बुक वैल्यू और स्टॉक के पी/ई व पी/बी अनुपात का कोई फर्क नहीं पड़ता। वहां तो बस इतना देखना पड़ता है कि धन का प्रवाह किन स्टॉक्स का पीछा कर रहा है और किनसे दूर भाग रहा है। खासकर, एफआईआई का रुख क्या है? यह भी कि इस दौरान एचएनआई और प्रोफेशनल ट्रेडरों का क्या व्यवहार है? डीआईआई तो हमेशाऔरऔर भी

अमूमन इंट्रा-डे ट्रेडर के लिए वही स्टॉक्स माफिक होते हैं जो 52 हफ्तों के शिखर से 2-4% नीचे हों। ऐसे स्टॉक्स निफ्टी-50 से लेकर नेक्स्ट-50 और दूसरे सूचकांकों में साफ देखा सकता है। इन्हें देखकर ट्रेडर को अपना-अपना नियम-कायदा या अल्गोरिदम लगाना पड़ता है। लेकिन चूंकि स्विंग, मोमेंटम या पोजिशनल ट्रेडर कम से कम 5-10% कमाने के लिए ट्रेड करते हैं तो 52 हफ्ते के शिखर से 2-4% नीचे चल रहे स्टॉक्स उन्हें नहीं जमते। उन्हें तोऔरऔर भी

छठ पर्व में भले ही डूबते सूरज को अर्घ्य दिया जाता हो। लेकिन शेयर बाजार में हमेशा उगजे सूरज को ही ट्रेडिंग के लिए चुना जाता है। शॉर्टसेल भा उन्हीं स्टॉक्स में की जाती है जिनके सितारे कुछ समय पहले तक बुलंद थे। कम से कम प्रोफेशनल ट्रेडरों का तो यही रवैया रहता है। बाज़ार में कई सॉफ्टवेयर हैं जो सारे स्टॉक्स में से छांटकर बता देते हैं कि कौन-से स्टॉक्स में साल से लेकर महीने औरऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के ट्रेडर को हमेशा होश रहना चाहिए कि उसे दिमाग का योद्धा बनना है। इसमें अगर वह महारथी बन गया तो न केवल उसकी पूंजी हमेशा सलामत रहेगी, बल्कि नियमित रूप से बढ़ती भी रहेगी। हम अपना युद्ध अपनी सोच के दम पर लड़ते हैं, न कि तेज़ इंटरनेट कनेक्शन या शानदार ट्रेडिंग टर्मिनल के दम पर। यह भी याद रहे कि यहां हर किसी के अपने स्वार्थ हैं और हर कोई हर दूसरे काऔरऔर भी

कुछ लोग कमोडिटी या जिंस बाज़ार को शेयर बाज़ार से जोड़कर देखते हैं। वे भूल जाते हैं कि कमोडिटी बाज़ार में भाव सीधे-सीधे मांग व आपूर्ति के संतुलन से तय होते हैं और इसमें मांग व आपूर्ति की कोई सीमा नहीं होती। वे असीमित हद तक जा सकती हैं। लेकिन शेयर बाज़ार में हर कंपनी के शेयरों की चुकता पूंजी सीमित है। उसकी आपूर्ति नहीं बढ़ाई जा सकती है। मगर, मीडिया में माहौल बनाकर उसके शेयर कीऔरऔर भी

कुछ लोगों का दिमाग बड़े रैखिक तरीके से चलता है। वे हिसाब लगाते हैं कि कोई शेयर या सूचकांक महीने में 10% बढ़ा तो छह महीने में 60% और दस महीने में 100% बढ़ जाएगा। लेकिन यह सांख्यिकी तक का भ्रमजाल है और शेयर बाज़ार में तो ऐसा हिसाब-किताब चलता ही नहीं। अब तक ऐसा हुआ है तो आगे उसी दिशा में ऐसा-ऐसा होगा, कोई ट्रेडर अगर ऐसा सोचकर चले तो समझ लीजिए कि उसका विनाशकाल शुरूऔरऔर भी

भारत जैसे उभरते देशों के शेयर बाज़ार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश बनकर आ रहे धन का प्रवाह कुछ महीनों में टूट सकता है। अमेरिका के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व द्वारा बॉन्ड की खरीद कम किए जाने से सिस्टम में धन की उपलब्धता घटेगी और ब्याज दर बढ़ेगी। नतीजतन, उसका प्रवाह धीमा पड़ेगा। फिर भी विदेशी धन ज्यादा रिटर्न की चाह में निश्चित रफ्तार से आता रहा तो भारत जैसे शेयर बाज़ार पहले की तरह कुलांचे मारते रहऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की तेज़ी या मंदी एकतरफा नहीं होती। उसका ग्राफ कभी एकदम सीधी रेखा में नहीं चलता। एक स्तर पर पहुंचने के बाद वह टूटता है, दिशा बदलता है और नया चक्र शुरू हो जाता है। इन चक्रों के ऊपर कोई सुपर-चक्र नहीं होता जो लगातार लम्बे समय तक एक ही दिशा में बढ़ता चला जाए। बाज़ार में मार्च 2020 के बाद तेज़ी का जो चक्र चल रहा है, वह भी देर-सबेर टूटेगा, दिशा बदलेगा। यहऔरऔर भी

लक्ष्मी का रूप बदलने से समाज की तमाम दीवारें टूटती गईं। पहले अपने यहां कहा जाता था – जाति न पूछो साधु की। अब नोटों के वर्चस्व ने सही मायनों में जाति-धर्म की सारी दीवारें तोड़ दी हैं। राजनीति ने निहित स्वार्थों के चलते बचाए न रखा होता तो आज जाति-धर्म की दीवारों का नामोनिशान तक नहीं मिलता। उधर अंतरराष्ट्रीय व्यापार मुद्राओं की देशी सीमाएं तोड़ चुका है। दुनिया में आज डॉलर कहीं भी चलता है। अंग्रेज़ीऔरऔर भी

विनिमय मूल्य शुरुआत में वस्तुओं में निहित था। पांच-छह दशक पहले तक अपने यहां सामान्य किसान बाज़ार में अनाज देकर हल्दी, नमक व साबुन वगैरह लिया करते थे। लेकिन धीरे-धीरे विनिमय का माध्यम मुद्राएं बनने लगीं। मुद्राएं चूंकि संप्रभु होती हैं, देश की सीमाओं में चलती हैं बाहर नहीं तो उन पर सरकारी तंत्र का नियंत्रण बना। देशों का आपसी व्यापार बढता गया तो बाज़ार में मुद्राओं की आपसी विनिमय दर तय होने लगी। मुद्रास्फीति से देशऔरऔर भी