छवि इर्दगिर्द
यहीं थोड़ी दूर कहीं हमारा बचपन खेल रहा होगा। पड़ोस में कहीं हमारा बुढ़ापा खांस रहा होगा। देखना चाहें तो अपना अतीत व भविष्य अपने ही इर्दगिर्द देख सकते हैं। हम क्या थे, क्या बनेंगे, समझ सकते हैं।और भीऔर भी
यहीं थोड़ी दूर कहीं हमारा बचपन खेल रहा होगा। पड़ोस में कहीं हमारा बुढ़ापा खांस रहा होगा। देखना चाहें तो अपना अतीत व भविष्य अपने ही इर्दगिर्द देख सकते हैं। हम क्या थे, क्या बनेंगे, समझ सकते हैं।और भीऔर भी
हम सभी अपने वर्तमान से दुखी, अतीत पर मुग्ध और भविष्य को लेकर डरे हुए क्यों रहते हैं? क्या हम आज को लेकर मगन, बीत चुके पल के प्रति निर्मम और आनेवाले कल को लेकर बिंदास नहीं हो सकते?और भीऔर भी
आज के जरूरी खर्च हम कल पर नहीं टाल सकते और कल का निवेश आज रोक नहीं सकते क्योंकि उपभोग तो आज की जरूरत पूरा करने के लिए ही है जबकि निवेश आज की नहीं, कल की सोचकर आज किया जाना है।और भीऔर भी
महान अतीत हमारे पीछे है। संभावनामय भविष्य हमारे आगे है। इन दोनों के बीच की अटूट कड़ी हैं हम। अतीत के वारिस और भविष्य के ट्रस्टी। जरा सोचिए, हमारी पीढ़ी को कितनी बड़ी जिम्मेदारी निभानी है।और भीऔर भी
कविवर बिहारी का यह दोहा आपको भी याद होगा कि रे गंधि! मतिअंध तू, अतरि दिखावत काहि, कर अंजुरि को आचमन, मीठो कहत सराहि। सुगंध बेचनेवाले तू इन लोगों को इत्र दिखाने की मूर्खता क्यों कर रहा है। ये लोग तो इत्र को अंजुरी में लेकर चखेंगे और कहेंगे कि वाह, कितनी मीठी है। लेकिन कभी-कभी मूर्खता दिखाने में भी फायदा होता है। कैसे? तो… आपको एक कहानी सुनाता हूं। एक समय की बात है। उज्जैनी राज्यऔरऔर भी
हम सब के पास दो टाइम मशीन हैं। एक मशीन हमें समय में पीछे तक ले जाती है, सुदूर अतीत में पहुंचा देती है, उसे हम याददाश्त कहते हैं। दूसरी टाइम मशीन हमें भविष्य में उड़ा ले जाती है, उसे हम ख्वाब कहते हैं।और भीऔर भी
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