भारत को विकासशील से विकसित देश बनने में कम से कम दस साल लगेंगे। इसी हिसाब से देश में टैक्स संग्रह भी बढ़ना चाहिए। इस बार टैक्स संग्रह का लक्ष्य जीडीपी का 10.82% रखा गया है। विकासशील देशों में यह अमूमन 10-20% रहता है, जबकि विकसित देशों में इसकी रेंज 30-40% रहती है। अर्थशास्त्री कहते हैं कि भारत को इसे दो-तीन साल में 15% और पांच-सात साल में 20% तक पहुंचा देना चाहिए। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

आज बजट का दिन है। तय कार्यक्रम के मुताबिक वित्त मंत्री अरुण जेटली 11 बजे से लोकसभा में भाषण शुरू कर देंगे। बाज़ार की धारणा चूंकि विदेशी पूंजी व विशेषज्ञों की राय से बनने लगी है। इसलिए सबसे अहम होगा कि राजकोषीय घाटे और जीडीपी का वास्तविक अनुपात इस बार कितना रहा और नए वित्त वर्ष के लिए उसका अनुमान क्या है। लेकिन हमारे लिए कहीं ज्यादा अहम है कि टैक्स-जीडीपी का अनुपात। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

हमारे बैंकिंग क्षेत्र पर डूबत ऋणों का साया लहरा रहा है। रिजर्व बैंक ने इनके प्रावधान का जो नियम बनाया है, उससे अगले एक साल में बहुत सारे बैंकों का मुनाफा सफाचट हो जाएगा। सबसे बुरा असर सरकारी बैंकों पर पड़ेगा। इनमें से बहुतों का मुनाफा इसी साल 30-70% घट सकता है। निजी क्षेत्र के बैंक भी अनर्जक ऋणों के लपेटे में हैं। लेकिन इनमें से एक बैंक मजबूती से डटा है। आज तथास्तु में वही बैंक…औरऔर भी

हर तरह की कंपनियों के शेयरों में ट्रेड करनेवाले लोग अलग-अलग होते हैं। जो अल्गोरिदम ट्रेडिंग करते हैं, वे निफ्टी या सेंसेक्स से बाहर की कंपनियों को हाथ नहीं लगाते। मिड कैप या स्मॉल कैप स्टॉक्स में अलग तरह के ट्रेडर काम करते हैं। फार्मा, इंफ्रा या रीयल एस्टेट में अलग किस्म के पेशेवर ट्रेडरों की दिलचस्पी होती है। इसीलिए इन स्टॉक्स की चाल अलग होती है। यह सच हमें समझना ज़रूरी है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हमें मुख्य रूप से एनएसई में लिस्टेड लगभग 1600 कंपनियां पर ही ध्यान देना चाहिए क्योंकि उनमें सक्रियता ज्यादा होती है और वे अमूमन बीएसई में भी लिस्टेड होती हैं। आप गौर करें तो पाएंगे कि सूचकांकों की चाल, उसमें शामिल कंपनियों की चाल और सूचकांकों से बाहर की कंपनियों की चाल एक जैसी हो, यह ज़रूरी नहीं। ऐसे में हमें ठोंक-बजाकर ट्रेडिंग के लिए 20 से 25 कंपनियां चुन लेनी चाहिए। अब देखें गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

दुनिया के सामने अपनी आर्थिक चुनौतियां हैं तो भारत की अर्थव्यवस्था के सामने अलग चुनौतियां हैं। सरकार इनसे कैसे निपटती है, इसी पर बाज़ार की अगली चाल निर्भर है। जिस इंफ्रास्ट्रक्चर को चढ़ाने की बात हो रही थी, उसके विकास से जुड़ी प्रमुख सरकारी कंपनी भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स के शेयर एक-दो नहीं, दस साल की तलहटी पर आ चुके हैं। अभी इसके 30% और गिरने की बात की जा रही है। अब आजमाते हैं बुध की बुद्धि…औरऔर भी

बाज़ार को लेकर हम अमूमन केवल दो ही दिशाओं के बारे में सोचते हैं। ऊपर जाएगा कि नीचे? नहीं सोचते कि अगर पिछले दो सालों की तरह समय बीतने के साथ कहीं न गया तो? अभी जो सूरतेहाल है, उसमें जब तक लिस्टेड कंपनियों का मुनाफा ठहरा है, तब तक सूचकांक, कंपनियों के शेयर भाव अटके रहेंगे क्योंकि जोश में जमकर चढ़ा पी/ई अनुपात फिलहाल एकदम ज़मीन पर आ चुका है। अब पकड़ते है मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

करीब दो साल पहले मोदी सरकार बनने से तीन दिन पहले सेंसेक्स 23,871.23 पर बंद हुआ था। अभी बीते शुक्रवार को 23,709.15 पर बंद हुआ है। ऊपर उठा बाज़ार अब सम हो चुका है। अभी कितना नीचे जाएगा, कहा नहीं जा सकता। बहुत मुमकिन है कि यूं ही सीमित दायरे में ऊपर-नीचे होता रहे। असल में बाज़ार की सटीक चाल क्या होगी, इसे जानना असंभव है। ऐसे में क्या हो ट्रेडिंग की रणनीति? अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बाज़ार अगर जाति-धर्म या पद-पदवी का भेद करे तो चल ही नहीं सकता। इसी के पूरक के बतौर लोकतांत्रिक व्यवस्था निकली है। बाज़ार का ही कमाल है कि आज कोई भी शख्स तमाम बड़ी कंपनियों के मालिकाने का हिस्सा खरीद सकता है। लेकिन यही प्रोत्साहन खेती में गायब है। अगर आप किसान नहीं हैं तो महाराष्ट्र या गुजरात जैसे देश के कई राज्यों में खेती के लिए ज़मीन नहीं खरीद सकते। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

खरीद हमेशा वहां से शुरू करनी चाहिए जहां से संस्थाएं व प्रोफेशनल ट्रेडर एंट्री ले सकते हैं। पर, चूंकि इसकी कोई गारंटी नहीं होती, इसलिए पहले 25% खरीद ही करनी चाहिए। उसके बाद भाव अपनी दिशा में गए तो 35% और फिर बाकी 40% खरीद। इस क्रम में हमेशा स्टॉप लॉस एंट्री मूल्य से 1.5-2% कम रखना चाहिए। वहीं, बेचते समय पहले 40%, फिर 35% और आखिर में 25% निकालते हैं। अब करते हैं शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी