सहज-सी बात है कि लोगबाग जब बाज़ार में मौका देखते हैं, तभी अपना धन दांव पर लगाते हैं। गलती हो जाए तो इसका खामियाज़ा खुद भुगतते हैं और अपना दांव सुधार लेते हैं। इस तरह बराबर सीखते और खुद को दुरुस्त करते रहते हैं। लेकिन कुछ लोग चंद सौदों पर सारी ट्रेडिंग पूंजी लगा देते हैं और सीखने-समझने का आधार ही गंवा देते हैं। इस तरह के लोगों को कोई नहीं बचा सकता। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बचत व निवेश हम इसीलिए करते हैं ताकि संकट के समय सांसत में न फंस सकें। लेकिन संकट के समय में दो सबसे ज्यादा काम आनेवाली चीजें हैं कैश व साहस। साहस हमारे स्वभाव का हिस्सा है जो प्रतिकूलता से  जूझते हुए स्वाभाविक रूप से आकार लेता है। लेकिन कैश हमें बराबर संभालकर रखना पड़ता है और अधिकांश  निवेश ऐसे माध्यमों में करना चाहिए जिसे हम फौरन कैश में बदल सकें। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

हर बाजार की अपनी-अपनी खासियत होती है। दिल्ली के खारी बावली, चावड़ी बाज़ार चले जाइए या मुंबई के मंगलदास मार्केट। तेल से लेकर मेटल तक की थोक दुकानों में छोटी-छोटी गद्दियों पर बैठकर लोग करोड़ों का धंधा करते हैं। उन्हें अपने बाज़ार की रत्ती-रत्ती भर की खबर होती है। डिमांड व सप्लाई का अभी का ही नहीं, आगे का भी पूरा भान होता है। क्या आपको शेयर बाज़ार का इतना भान है? अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

देश जब अंग्रेज़ों का गुलाम था, व्यापार-धंधे पर तरह-तरह की बंदिशें लगी हुई थीं, तब भी यहां कुछ नहीं मिला तो लोगों ने शेयर बाज़ार का धंधा बरगद के पेड़ के नीचे ही बैठकर शुरू कर दिया। जी हां! आज के बीएसई की शुरुआत 142 साल पुरानी 1874 की है। यह बात दीगर है कि तब यह मुठ्ठीभर ब्रोकरों तक सीमित था। वहीं, आज इससे 3.17 करोड़ निवेशक जुड़े हुए हैं। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

भारत में बाज़ार की बेहद लंबी परंपरा रही है। जापान जहां चावल के धंधे का उस्ताद था, टेक्निकल एनालिसिस की कैंडलस्टिक करीब 270 साल पहले वहीं के राइस फ्यूचर्स से शुरू हुई थी; वहीं भारत मसालों से लेकर रुई तक के व्यापार का सरगना था। गुजरात में रुई के भाव खुलते थे और टेलिफोन जैसे साधन न होने के बावजूद चंद घंटों में सारे देश में वही भाव चलने लगते थे। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

देश आज़ादी के सत्तरवें साल में प्रवेश कर गया। अब तक के उनहत्तर सालों के अनुभव ने साफ कर दिया है कि हमने बाजार को जितना समझा और बाज़ार शक्तियों को जितना मुक्त किया है, बड़ों से लेकर छोटों तक के विकास के अवसर उतने ही ज्यादा खुले हैं। वहीं, सरकार ने जहां-जहां अपना अंकुश कसा है, वहां-वहां बंटाधार हुआ है। शिक्षा, स्वास्थ्य व सुरक्षा में सरकार की पक्की भूमिका है। बाकी नहीं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

अच्छी कंपनी उतनी ही मेहनत में ज्यादा मूल्य पैदा कर लेती है। विकसित देश वो है जो एकसमान मेहनत व संसाधनों में ज्यादा मूल्य सृजित करता है। साथ ही समान मेहनत के वो ज्यादा दाम देता है। अपने यहां कामगार को ज्यादा वेतन देता है और समाज में ज्यादा सुविधाएं उपलब्ध कराता है। विकास का तब तक कोई मतलब नहीं है, जब तक वो मूल्य नहीं पैदा करता। तथास्तु में विकास व मूल्य-सृजन में लगी एक कंपनी…औरऔर भी

केंद्र सरकार ने नई व्यवस्था यह की है कि अब ब्याज दरों का फैसला रिजर्व बैंक के गवर्नर नहीं, बल्कि छह सदस्यों की समिति करेगी जिसमें तीन सदस्य रिजर्व बैंक और तीन सरकार द्वारा मनोनीत अधिकारी होंगे। साथ ही सरकार ने अगले पांच साल के लिए मुद्रास्फीति को 4% तक बांधे रखने का लक्ष्य किया है। जाहिर है कि मुद्रास्फीति कम रखने के लिए ब्याज दर बढ़ाने की कसरत की जाती रहेगी। अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बाज़ार में किसी दूसरी चीज़ की तरह पूंजी के दाम का फैसला भी मांग और आपूर्ति के संतुलन से होना चाहिए। मांग ज्यादा, आपूर्ति कम तो ब्याज दर बढ़े। मांग कम तो ब्याज घटे। लेकिन दुनिया भर के केंद्रीय बैंक इस मामले में खुल्लमखुल्ला धांधागर्दी चला रहे हैं। अमेरिका ने नोट छापकर सिस्टम में डालने का काम 2008 में शुरू किया। 2009 में यूरोप और 2010 में जापान ने ऐसा किया। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

आज सब कुछ बाज़ार के हवाले है तो माना जाता है कि सरकार नहीं, बल्कि बाज़ार को ही सारे आर्थिक संतुलन का फैसला करने देना चाहिए। चीन समाजवादी देश है तो वहां सरकार का वर्चस्व समझ में आता है। लेकिन बाज़ार अर्थव्यवस्था में गहरा यकीन रखनेवाले अमेरिका, यूरोप व जापान जैसे देशों में पूंजी के दाम या ब्याज दर का फैसला आखिर सरकार की तरफ से वहां के केंद्रीय बैंक क्यों करते हैं? अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी