भारत दुनिया में अमेरिका व चीन के बाद कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। हम अपनी मांग का 88% कच्चा तेल आयात करते हैं। एलपीजी और एलएनजी की जरूरत का भी 80-85% आयात करते हैं। कच्चे तेल और गैस का बड़ा हिस्सा हम पश्चिम एशिया या मध्य-पूर्व के देशों से लाते हैं। अमेरिका-इज़राइल और ईरान के युद्ध से यह पूरा आयात खतरे में पड़ गया है, खासकर ईरान द्वारा होर्मुज़ स्ट्रैट को बंद करऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के तमाम मंत्री-संत्री अमेरिका व इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध पर कुछ भी साफ नहीं बोल रहे। उनके चंगू-मंगू और भड़वा-टाइप पत्रकार ज़रूर चिल्ला रहे हैं कि सरकार की विदेश नीति देशहित को केंद्र में रहकर चलती है और ईरान का साथ न देना भारत के राष्ट्रीय हित में है। कोई उनसे पूछे कि जो हमला समूची दुनिया के हित में नहीं है, वो भारत के हित में कैसेऔरऔर भी

डोनाल्ड ट्रम्प ललकार रहे हैं कि ईरान के खिलाफ युद्ध चार-पांच हफ्ते चलेगा। वहीं, ईराने अपने वजूद के लिए लड़ रहा है तो वह तब तक लड़ेगा, जब तक अमेरिका पीछे नहीं हट जाता। साथ ही इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू का सफाया उसका लक्ष्य है। ईरान बार-बार कह चुका है कि उसने तो डिप्लोमैसी का राह चुनी थी और युद्ध उस पर थोपा गया है। तथ्यों से भी यही सच निकलता है। जून 2025 में भीऔरऔर भी

ईरान पर अमेरिका व इज़राइल के हमले ने न केवल वहां के सत्ता शीर्ष को खत्म कर दिया है, बल्कि सारी दुनिया में भूचाल ला दिया है। पूरा मध्य-पूर्व सुलझ रहा है। ट्रम्प ईरान के अवाम को सत्ता कब्ज़ा करने के लिए उकसा रहे हैं। लेकिन ईरान सरकार में नेतृत्व की दूसरी रैंक ने मोर्चा संभाल लिया है। उसके लिए यह राजनीति ही नहीं, विचारधारा की लड़ाई है। ईरान पर हमले का रूस और चीन, दोनों नेऔरऔर भी

बदलाव ही शाश्वत व स्थाई है। बाकी सब बराबर बदलता ही रहता है। देश में बचत का स्वरूप भी बदल रहा है। वित्त वर्ष 2011-12 में घरों की वित्तीय बचत का 58% हिस्सा बैंक एफडी में जाता था। यह हिस्सा 2024-25 तक घटकर 35% पर आ गया। लोग अब शेयर बाज़ार में म्यूचुअल फंड के जरिए परोक्ष या स्टॉक्स के जरिए प्रत्यक्ष निवेश ज्यादा करने लगे हैं। 2013-14 में उनकी वित्तीय बचत का 11% हिस्सा शेयर बाज़ारऔरऔर भी

देश में सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) का अटका भुगतान बड़ी सरकारी व निजी कंपनियों से दिलवाने के लिए जनवरी 2017 से लागू ट्रेड रिसीवेबल डिस्काउंटिंग सिस्टम या ट्रेड्स (TReDS) की व्यवस्था अपनी सामर्थ्य दिखा चुकी है। लागू होने पहले साल वित्त वर्ष 2017-18 में इस प्लेटफॉर्म से छोटे उद्यमों को ₹950 करोड़ ही मिल सके। लेकिन वित्त वर्ष 2021-22 में यह रकम ₹40,000 करोड़ और वित्त वर्ष 2024-25 मे ₹2.33 लाख करोड़ तक जा पहुंची।औरऔर भी

भारत के आर्थिक इतिहास का दुखद सच है कि यहां छोटे उद्योग व व्यापार की कभी कद्र नहीं हुई। सरकारी और निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों पर ही सरकार की कृपा बरसती रही। औद्योगिक नीति में पीएलआई जैसी सब्सिडी बड़ी कंपनियों को मिलती रही। इन्हीं नीतियों का नतीजा है कि अक्सर छोटी कंपनियां बाल्यावस्था से प्रौढ़ बनते हुए बड़ी नहीं बनतीं, बल्कि बौनी ही रह जाती हैं। उम्मीद थी कि यह सच्चाई बदल जाएगी। खासकर जनवरी 2017औरऔर भी

छोटे उद्योग-धंधों के भुगतान की समस्या हल करने के लिए ट्रेड रिसीवेबल डिस्काउंटिंग सिस्टम या ट्रेड्स (TReDS) जनवरी 2017 से लागू कर दिया गया। फिर भी यह समस्या उस गति से नहीं सुलझी, जिस गति से सुलझनी चाहिए थी। 2021 के अंत तक इन एमएसएमई इकाइयों का ₹10.7 लाख करोड़ का भुगतान बड़ी सरकारी व निजी कंपनियों के पास अटका पडा था। मार्च 2024 तक भी यह रकम घटकर ₹7.34 लाख करोड़ पर पहुंच सकी। यह रकमऔरऔर भी

बड़ी सरकारी और निजी कंपनियों द्वारा एमएसएमई इकाइयों का भुगतान लटकाने की समस्या सुलझाने के लिए मनमोहन सिंह सरकार ने साल 2011 में फैक्टरिंग रेग्युलेशन एक्ट बनाया था। यह सही दिशा में उठा कदम था और इसने एमएसएमई की फाइनेंसिंग व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए एक कानूनी फ्रेमवर्क बना दिया। फिर भी समस्या सुलझी नहीं। साल 2014 में रिजर्व बैंक ने इस बाबत एक कॉन्सेप्ट पेपर पेश किया, जिसके आधार पर आज का ट्रेड रिसीवेबल डिस्काउंटिंग सिस्टमऔरऔर भी

एमएसएमई क्षेत्र हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, चाहे वो निर्यात हो या रोज़गार सृजन। लेकिन देश के सत्ताशीर्ष पर बारह सालों से बैठा शक्स इस रीढ़ को ही तोड़ने में लगा है। यह कितना बड़ा छलिया है कि सत्ता संभालने के पहले दिन से खुद को इस क्षेत्र को रहनुमा बताता रहा है। इसके झूठ को मीडिया का भोंपू इतना बढ़ा देता है कि उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम हर कोने से त्राहिमाम करते इस क्षेत्र की पुकार किसी कोऔरऔर भी