सब कुछ देखने के तरीके पर निर्भर करता है। चाहो तो सारी दुनिया दोस्तों से भरी नजर आएगी। पेड़-पालव तक मदद के लिए हाथ बढ़ाते दिखेंगे। और, चाहो तो घर का आदमी भी बैरी दिखेगा। इसमें से चुनना आपको ही है।और भीऔर भी

पुराने के भीतर नया पनपता रहता है। प्रकृति में पुराना हमेशा नए को जगह दे देता है। लेकिन समाज में पुराना अपनी जगह सहजता से छोड़ने को तैयार नहीं होता। इसलिए संघर्ष होता है, खून-खच्चर होता है।और भीऔर भी

इस जहान में निरपेक्ष या निष्पक्ष जैसा कुछ नहीं। यह कोई मंजिल नहीं, एक अवस्था है प्रकृति के स्वभाव के साथ एकाकार होने की। तलवार की धार पर संतुलन नहीं बन पाता तो हम इधर या उधर के हो जाते हैं।और भीऔर भी

प्रकृति और हमारे बीच मां-बच्चे का रिश्ता है। इसलिए उसे समझना और उसके हिसाब से ढलना मुश्किल नहीं होता। लेकिन समाज और उसके विभिन्न अवयवों को बगैर माथापच्ची के नहीं समझा जा सकता।और भीऔर भी

प्रकृति ने हर जीव को बचाव का कोई न कोई साधन अलग से दे रखा है। शेर को दांत व पंजे, बैल को सींग व खुर तो कीड़े-मकोड़ों को रंग बदलने की क्षमता। इसी तरह इंसान को उसने सोचने की ताकत दे रखी है।और भीऔर भी

जैसे कोई खुद को खोजने की निशानियां जान-बूझकर छोड़े जा रहा हो, जैसे कोई मां अभी-अभी चलना सीखे बच्चे के साथ लुकाछिपी खेलती है, उसी तरह हर सवाल अपने समाधान के सूत्र हमारे आसपास ही रख छोड़ता है।और भीऔर भी

अंधविश्वासी व्यक्ति को अपार धन के बावजूद कभी भी वो खुशी नहीं मिल सकती है जो किसी उन्मुक्त मन को मिलती है। हर खुशी का स्रोत प्रकृति है और प्रकृति उसे ही देती है जो उससे डरता नहीं, दो-दो हाथ करता है।और भीऔर भी

प्रकृति में कुछ भी बेकार नहीं जाता। खाद बन जाता है। इसी तरह समाज में जो भी खुद को मिसफिट पाते हैं, वे असल में कल के सृष्टि बीज होते हैं। इन्हें हालात से घबराने के बजाय कल की तैयारी में जुट जाना चाहिए।और भीऔर भी

जो लोग अपने समय से बहुत आगे या पीछे होते हैं, वे ज्यादा नहीं जीते। और, जो लोग अपने समय के साथ चलते हैं, वे दार्घायु होते हैं। समय के साथ प्रकृति का यही करार है। दोनों का यही तालमेल है।और भीऔर भी

जो बाहर है, वही तो अंदर है। प्रकृति ही बाहर है और भीतर भी। इसलिए किसी के सामने झुककर आपके अंदर की शक्ति नहीं जगती। इसके लिए तो अंदर की इंजीनियरिंग और सर्जरी जरूरी है।और भीऔर भी