दूरी से भगवान
2012-07-21
हम जीते-जी इंसान में भगवान तलाशते रहते हैं। खूबियां छोड़ उसकी खामियां निकालते हैं। पर मरते ही महिमामंडित करके भगवान बना देते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वायवी व मायावी भगवान के आगे हमें छोटा बनना मंजूर है, असली इंसान के आगे नहीं।और भीऔर भी
भावनाओं की प्रकृति
2012-06-11
समाज का मुलम्मा भले ही लगा हो, लेकिन हमारी सारी भावनाओं का स्रोत मूलतः प्रकृति ही होती है। शरीर के रसायन और खुद को संभालने व गुणित करते जाने का प्राकृतिक नियम हमें नचाता रहता है। हमारा अहं भी प्रकृति की ही देन है।और भीऔर भी



