ऐसा रोलओवर! ईनाम नियामकों को

न भूतो न भविष्यते…रोलओवर के दौरान सागर में जैसा चमकता मोती? बाजार के आखिरी आधे घंटे ने यकीनन मुझे गलत साबित कर दिया। ऐसा नियोजित और सटीक खेल खेला गया जो मेरे लिए एकदम नया था और जिसका अनुमान लगाना वाकई नामुमकिन था। मैं यह बात दिल से स्वीकार करता हूं। कितना विकसित और प्रोफेशनली नियमित है हमारा भारतीय पूंजी बाजार! जिन्होंने इस बाजार की व्यवस्थाएं बनाई हैं, उन्हें बधाई दी जानी चाहिए और सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिए। अभी तक फिजिकल डिलीवरी की व्यवस्था नहीं है और जब तक यह व्यवस्था होगी तब तक बाजार 30,000 अंकों का नया शिखर बना सकता है।

वैसे, इससे हम पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मैंने कुछ स्टॉक्स में रोलओवर होते देखा और आपको इन्हें आगे ले जाने की लागत जानकर खुशी होगी क्योंकि यह दुनिया में संभवतः सबसे ज्यादा है और जो भारतीय पूंजी बाजार के लिए एक और ग्रैंड स्लैम बना सकता है। निफ्टी अक्टूबर 5987 पर और नवंबर 6075 पर। रोलओवर के लिए 88 अंक का प्रीमियम? 14 दिन के रोल्स की कीमत 1.46 फीसदी यानी अकेले निफ्टी में रोलओवर की लागत 3.12 फीसदी प्रति माह।

फ्यूचर्स सौदों में सेंचुरी नवंबर 515, अक्टूबर 501। 14 दिन के रोलओवर की लागत 2.79 फीसदी यानी एक महीने की 5.98 फीसदी। एचडीआईएल नवंबर 256 और अक्टूबर 251, रोल करने की लागत 4.26 फीसदी। आईडीबीआई 180 और 188, आगे ले जाने की कीमत 9.25 फीसदी। गेल 15 रुपए, सिप्ला 7 रुपए, रिलायंस मीडिया 10 रुपए, आरआईएल 19 रुपए, डीएलएफ 8 रुपए, केयर्न 8 रुपए, ऑर्किड 8 रुपए। यह अंतर था इन शेयरों के नवंबर व अक्टूबर के फ्चूचर्स में, यानी रोलओवर की लागत 4 फीसदी प्रति माह। यह फेहरिस्त और भी लंबी है। समझ में नहीं आता कि रिजर्व बैंक माइक्रो-फाइनेंस में 24 फीसदी ब्याज दरों के ज्यादा होने पर चिल्ला क्यों रहा है?

अभी तो मुझे पहले के विख्यात या कुख्यात बदला सिस्टम की याद आ रही है जिसमें कम से कम चीजें स्टॉक एक्सचेंज के नियंत्रण में थीं और बदला की दरें वास्तविक डिलीवरी और डिलीवरी में कमी के आधार पर तय की जाती थीं। रोलओवर या कैरी फॉरवर्ड अपने-आप होता था जिसका मतलब हुआ कि हम पूरे 20 दिन (महीने में कारोबार के दिन) की लागत चुकाया करते थे। आज तो हम भारी उतार-चढ़ाव के बीच एक दिन में 6 दिनों के रोलओवर की कीमत चुकाते हैं। कुछ लोग कह सकते हैं कि यह स्प्रेड है जिसके हम अधिकारी हैं और इसीलिए यह व्यवस्था है।

इस सबका क्या मतलब? हां, कल जरूर समस्या हुई थी जब मंदड़ियों ने अपने शॉर्ट सौदों को रोल करने से इनकार कर दिया क्योंकि ऐसा करना बहुत महंगा था और तेजड़ियों ने इस लागत को और फैला दिया। ज्यादातर खिलाड़ी शॉर्ट सौदों को आगे नहीं ले जा सके और रोलओवर के न होने से डिफॉल्ट कर गए। यहां तक कि तेजड़िए भी अपनी लांग या खरीद की पोजिशन को संभाल नहीं कर सके। उन्होंने बस हाथ खड़े कर दिए। कल तक 1,02,000 करोड़ रुपए का रोलओवर हुआ था (पिछले महीने की मुश्किल में फंसी 50,000 करोड़ रुपए की पोजिशन समेत)। चालू महीने का ओपन इंटरेस्ट 98,000 करोड़ रुपए रहा था।

इस अंतर ने उन सभी के विश्वास को हिलाकर रख दिया है जो आप्शंस के साथ-साथ फ्चूयर्स में तरह-तरह के दांव खेलने की कोशिश करते हैं। रोलओवर तो आखिरी मिनट की भागमभाग तक इंतजार नहीं करता। यह संदेश दिया है बाजार ने। यही वजह है कि 80 फीसदी रिटेल निवेशक डेरिवेटिव बाजार में खेलना पसंद करते हैं क्योंकि कैश बाजार विकसित नहीं है या वहां ट्रेड टू ट्रेड जैसी अनाप-शनाप मनमर्जी की बंदिशें लगी हुई हैं। वहां वोल्यूम नहीं है तो ब्रोकर रिटेल निवेशकों के सौदे पूरे नहीं करते क्योंकि उन्हें बताया गया है कि रिटेल निवेशक किसी भी शेयर में 10 फीसदी से ज्यादा वोल्यूम नहीं खरीद सकता। सुबह-सुबह 9.15 बजे कौन तय करेगा कि किसी शेयर में दिन भर का वोल्यूम कितना होगा? इससे अच्छा है कि डेरिवेटिव में खेलो, जहां जबरदस्त वोल्यूम है।

खैर जो भी हो। पूरा ड्रामा निफ्टी के 6080 से 5950 तक जाने के महज तीन मिनटों में हुआ। मैं अब भी मानता हूं कि छोटे निवेशकों को घबराना नहीं चाहिए। निफ्टी 5800 तक भी चला जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता। बाजार का नई ऊंचाई पर जाना तय है। सबसे ज्यादा रोलओवर शुगर, टेक्सटाइल, इंफ्रास्ट्रक्चर, रीयल्टी, टेलिकॉम, फर्टिलाइजर और होटल सेगमेंट में हुए हैं। इसलिए इन सेक्टरों में सक्रियता बनी रहेगी।

जो लोग सच की तलाश में लगे हैं, उन पर विश्वास करें और जो लोग सच पा जाते हैं, उन पर संदेह करें।

(चमत्कार चक्री एक अनाम शख्सियत है। वह बाजार की रग-रग से वाकिफ हैलेकिन फालतू के कानूनी लफड़ों में नहीं उलझना चाहता। सलाह देना उसका काम है। लेकिन निवेश का निर्णय पूरी तरह आपका होगा और चक्री या अर्थकाम किसी भी सूरत में इसके लिए जिम्मेदार नहीं होगा। यह कॉलम मूलत: सीएनआई रिसर्च से लिया जा रहा है)

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