बाजार की तेजी में भला उस्तादों का

अमेरिका का डाउ जोंस सूचकांक शुक्रवार को 267.01 अंक बढ़कर 11,808.79 पर पहुंच गया, जबकि इसका अब तक का शिखर 12,876 का है। वैसे, 12,876 का यह स्तर किसी अनार के फूटने की तरह था जो ज्यादा टिका नहीं। इसलिए 12,500 को डाउ का औसत उच्चतम स्तर माना जाता है। इस औसत से अमेरिकी शेयर बाजार गिरकर 10,405 तक चला गया था जो करीब-करीब 17 फीसदी की गिरावट दर्शाता है। लेकिन नीचे का स्तर भी ज्यादा टिका नहीं। इसलिए नीचे का औसत स्तर 11,000 माना जाता है।

कहने का मेरा मतलब यह है कि यूरोप को छोड़ दें तो अमेरिका दुनिया की मंदी से सबसे ज्यादा प्रभावित देश है। यूरोप को मैं गिनता नहीं क्योंकि वो बीआईएफआर का मामला बन चुका है। आपको पता ही होगा कि अपने यहां लाइलाज व बीमार हो चुकी कंपनियों को बीआईएफआर के हवाले कर दिया जाता है। अमेरिका की आर्थिक विकास दर एक फीसदी से नीचे हैं और बैंकों की ब्याज दर शून्य के करीब है। अमेरिका निवेश के लिए अब भी खतरनाक ठिकाना है क्योंकि वहां बैंकों के धंधे में इतना बुलबुला है कि कोई सोच भी नहीं सकता। फिर भी यह बाजार इस समय अपने औसत उच्चतम स्तर से केवल 5.5 फीसदी नीचे है जो वैश्विक बाजारों की हालत को देखते हुए नगण्य माना जाएगा।

असली मसला यह है कि लेहमान संकट के बाद डाउ जोंस 7000 के नीचे चला गया था और उस स्तर से अभी 75 फीसदी ऊपर है। ये आंकड़े बेहद अहम हैं क्योंकि अमेरिका बाजार खुद अपनी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करनेवाले लेहमान संकट के चलते डूबा था। हकीकत गवाह है कि वैश्विक संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित होने के बावजूद अमेरिका का शेयर बाजार उतना नहीं गिरा है, जितना कि भारत का शेयर बाजार गिरा है जबकि भारत दुनिया में तेजी से आर्थिक विकास करनेवाला अग्रणी देश है। अमेरिकी बाजार 5.5 फीसदी गिरा है, जबकि भारतीय बाजार में निफ्टी 22 फीसदी गिरकर 5000 पर आने के बावजूद संघर्ष किए जा रहा है।

हम कहना चाहते हैं कि वैश्विक संकट के जारी रहने के बावजूद भारत में तेजी की संभावना व हालात कायम है। यह सच है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, भ्रष्टाचार व रिश्वतखोरी हमारे लिए गंभीर समस्याएं हैं। लेकिन बाजार तो इन सबका जहर पी चुका है। ब्याज दरों का बढ़ना और औद्योगिक विकास की धीमी गति भी बाजार के लिए स्थापित सत्य है। जब अमेरिकी बाजार तक समान्य से बेहतर स्थिति में हैं तो अंतरराष्ट्रीय कारकों को एक तरफ रखकर अब हमें घरेलू कारकों के मद्देनजर ही चलना चाहिए। और, इसे देखते हुए हम तेजी की धारणा पर आए बगैर कैसे रह सकते हैं!!!

फिर भी ऐसा नहीं हो रहा है तो इसकी कुछ खास वजहें हैं। भारतीय पूंजी बाजार में साफ तौर पर सुधारों का अभाव है। यहां रिटेल निवेशकों को कोई तवज्जो नहीं दी जाती। कुछ बड़े एचएनआई (हाई नेटवर्थ इंडीविजुअल) निवेशक एफआईआई (विदेशी संस्थागत निवेशकों) के साथ मिलकर इतना उत्पाद मचाते हैं कि हम अतियों के बीच झूलते हैं। या तो भयंकर तेजी में चले जाते हैं या भयंकर मंदी के शिकार हो जाते हैं। सामान्य हालात में ऐसी वोलैटिलिटी की स्थिति कभी होनी ही नहीं चाहिए। एचएनआई और एफआईआई दोनों ही सूरत में नोट बनाने के लिए यह अतिवाद अपनाते हैं। लेकिन अभी जो हालात हैं, उनमें वे ज्यादा नोट तभी बना सकते हैं जब बाजार यहां से काफी ज्यादा बढ़ जाए। इसलिए बाजार में बढ़ने का सकारात्मक रुझान प्रबल है।

फिलहाल निराशा में डूबे रिटेल निवेशकों की तरफ से खरीदने से परहेज करना और ट्रेडरों की तरफ से शॉर्ट सौदे किए जाना हमें प्रेरित कर रहा है कि हम धारा के खिलाफ चलकर लांग रहने का रवैया अपना लें। लेकिन निफ्टी के 4700 या यहां तक कि 4500 तक गिरने की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद हमारी दृढ़ मान्यता है कि बढ़ने की उम्मीद के साथ खरीदना या लांग रहना ही सहीं रणनीति है जिसका फल अंततः निवेशकों व ट्रेडरों दोनों को ही मिलेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published.