एस्ट्रोज़ेन में बी से नहीं तो ए से माल

सारी दुनिया को अरसे से पता था कि चूंकि एस्ट्राज़ेनेका फार्मा इंडिया में विदेशी प्रवर्तक कंपनी की इक्विटी हिस्सेदारी 90 फीसदी है। इसलिए पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी के दिशानिर्देशों के मुताबिक उसे जून 2013 तक इसे घटाकर 75 फीसदी पर लाना होगा। अन्यथा उसे शेयर बाजार की गलियां छोड़कर कंपनी को डीलिस्ट कराना होगा। लेकिन महीने भर पहले 6 मार्च को जब देश के सबसे बड़े आर्थिक अखबार इकनॉमिक टाइम्स ने पेज नंबर 12 की लीड खबर लगाई कि दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी दवा कंपनी एस्ट्राज़ेनेका अपनी भारतीय सब्सिडियरी को डीलिस्ट कराने जा रही है और इसका मूल्य 3200 रुपए तक जा सकता है तो बाजार में सनसनी मच गई।

कंपनी ने अगले ही दिन खंडन जारी किया कि उसे अपनी विदेशी प्रवर्तक एस्ट्राज़ेनेका फार्मास्यूटिकल्स एबी, स्वीडन से डीलिस्टिंग के बारे में कोई सूचना नहीं मिली है और इसके अलावा उसे कुछ नहीं कहना है। लेकिन खबर से जो आग लगाई जानी थी, वह अब लग चुकी थी। इकनॉमिक टाइम्स इंटेलिजेंस ब्यूरो के ज्वालित व्यास ने क्या डील की होगी, यह तो पता नहीं, लेकिन एस्ट्राज़ेनेका फार्मा इंडिया का शेयर खबर छपने के दिन 2489 रुपए पर 52 हफ्ते का शिखर गया। एक दिन पहले 5 मार्च को यह शेयर नीचे में 2051 रुपए तक चला गया था। एक दिन में 21.35 फीसदी की पेंग!

हालांकि बंद भाव 2086.75 रुपए से 19.28 फीसदी ही ज्यादा था क्योंकि सर्किट ब्रेकर के कारण ज्यादा से ज्यादा एक दिन यह 20 फीसदी ही बढ़ सकता है। हो सकता है कि आगे यह सर्किट सीमा भी हटा दी जाए क्योंकि बीएसई ने तय किया है कि अगले हफ्ते सोमवार, 9 अप्रैल इसे बी ग्रुप से निकालकर ए ग्रुप में डाल दिया जाएगा। सोमवार, 2 अप्रैल को यह खबर आने के बाद इसका दो रुपए अंकित मूल्य का शेयर कल, 3 अप्रैल को बीएसई (कोड – 506820) में 3.36 फीसदी बढ़कर 2229.80 रुपए और एनएसई (कोड – ASTRAZEN) में 3.91 फीसदी बढ़कर 2230.60 रुपए पर बंद हुआ है।

जिस कंपनी के साल-सवा साल में डीलिस्ट हो जाने का अंदेशा है, उसे अचानक बी ग्रुप से निकालकर ए ग्रुप में डालने का औचित्य बस इतना है कि इसके गुब्बारे में और हवा भरी जानी है। इसके पीछे आम निवेशकों का कोई हित नहीं है, बल्कि खिलाड़ियों को उनको झांसा देकर और निचोड़ने का मौका देना है। कमाल की बात यह है कि एस्ट्राज़ेनेका फार्मा के शेयर में पहले से इतनी गैस भरी हुई है कि कोई समझदार निवेशक उसकी तरफ झांकेगा भी नहीं। दिसंबर तक के नतीजों के आधार पर उसका प्रति शेयर लाभ 24.45 रुपए है। इस तरह उसका शेयर इस समय, आप यकीन नहीं मानेंगे, 91.20 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है।

जिस शेयर की बुक वैल्यू मात्र 71.88 रुपए हो, उसे 2400 पर पहुंचा देने और फिर 3200 रुपए तक जाने का सब्जबाग दिखाने के पीछे का खेल क्या हमारे नियामकों को दिखता नहीं है। बीएसई तो एक्सचेंज है और इस स्टॉक को बी से ए ग्रुप में ले जाने का फैसला कर उसने दिखा दिया है कि वह खुद इस खेल में शामिल है। लेकिन क्या सेबी को इस तरह मीडिया की मदद में किसी स्टॉक में हो रहा खुला खेल नजर नहीं आता। लालच में आकर भोले-भाले आम निवेशक यूं ही ठगे जाते रहें तो सेबी के इस दावे का क्या मतलब है कि वह निवेशकों के हितों की रक्षा करने के लिए मुस्तैद है।

एस्ट्राज़ेनेका फार्मा इंडिया भले ही बहुराष्ट्रीय कंपनी की भारतीय शाखा हो। लेकिन ज्यादा खास कुछ कमाती नहीं। पिछले वित्त वर्ष 2010-11 में उसने 594.02 करोड़ रुपए की बिक्री पर 64.13 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ कमाया था। दो महीने पहले घोषित नतीजों के अनुसार दिसंबर 2011 की तिमाही में उसकी बिक्री 13.01 फीसदी बढ़कर 145.16 करोड़ रुपए पर पहुंच गई। लेकिन शुद्ध लाभ 47.25 फीसदी घटकर 14.94 करोड़ रुपए पर आ गया। फिर भी इस शेयर को कुछ उस्ताद लोग उछाले चले जा रहे हैं। सोचिए, जो शेयर इसी साल जनवरी को नीचे में 1229.40 रुपए तक गया हो, उसके मार्च में लगभग दोगुना होकर 2489 रुपए पर पहुंचने जाने का क्या तुक है।

कंपनी की इक्विटी मात्र 5 करोड़ रुपए है। इसका 90 फीसदी हिस्सा स्वीडन की मूल कंपनी के पास है। बाकी 0.07 फीसदी शेयर एफआईआई और 2.44 फीसदी शेयर डीआईआई के पास हैं। कंपनी के कुल शेयरधारकों की संख्या 6104 है। इसमें से 5865 यानी 96.08 फीसदी एक लाख रुपए से कम लगानेवाले छोटे निवेशक हैं जिनके पास कंपनी के मात्र 6.80 फीसदी शेयर हैं। कंपनी दो रुपए के शेयर पर 10 से 15 रुपए (500 से 750 फीसदी) लाभांश देती रही है, लेकिन 2000 रुपए के ऊपर चल रहे शेयर पर लाभांश की यील्ड मात्र 0.45 फीसदी पर आ जाती है।

बता दें कि एस्ट्राज़ेनेका फार्मा इंडिया हेल्थकेयर, क्लिनकल ट्रायल और को-प्रमोशनल सेवाओं में सक्रिय है। कंपनी के कुछ खास ब्रांड हैं – क्रेस्टर, सेलोकेन, सेलोमैक्स, मोरोनेम, नेकसियम लिंक्टस कोडैनी। अभी पिछले महीने बीते वित्त वर्ष 2011-12 में उसने छह नए उत्पाद बाजार में उतारे हैं। इनमें डिप्रिवैन, नैरोपिन, एनक्लेयर और ब्रिकासेफ शामिल हैं। क्या इनमें से किसी दवा का नाम आपने सुना है? नहीं तो इन कंपनी के शेयर के 3200 रुपए तक पहुंचने के झांसे में मत आइएगा। बाकी आपकी मर्जी।

Leave a Reply

Your email address will not be published.