डेरिवेटिव कैसे लीलता जा रहा कैश!

बाजार का जो भी खेल है, यहां अपग्रेड और डाउनग्रेड गलत वक्त पर होते हैं। हमने एसकेएस माइक्रो फाइनेंस को 800 रुपए पर डाउगग्रेड किया था और अब देखिए उसका हश्र क्या है। हमने एसबीआई को 3500 रुपए पर डाउनग्रेड किया था, बाजार अब कर रहा है। हमने मुथूत फाइनेंस के बारे में नकारात्मक राय रखी और लिस्टिंग पर उसका हाल-बेहाल सामने आ गया. है। हमें यकीन है कि यह स्टॉक घटकर 123 रुपए तक आ जाएगा क्योंकि यही वो मूल्य है जिस पर आईपीओ से पहले ऑपरेटरों को कंपनी के शेयर बेचे गए थे।

हमने मार्च में ही बता दिया था कि कैसे और क्यों अप्रैल अंत के तक कच्चे तेल के दाम नीचे आ जाने चाहिए। थोड़ी देर ही सही, लेकिन ऐसा हो रहा है। तेल की धार ढीली पड़ गई है और वो 87 डॉलर प्रति बैरल के हमारे लक्ष्य के करीब पहुंच रहा है। अमेरिका, भारत और चीन के पास जरूरत से ज्यादा तेल था और है। दूसरे, दुनिया में तेल की सप्लाई बढ़ गई है। लीबिया का मसला हल होने से इसमें 31 लाख बैरल (हालांकि बाजार के लोग इसे 18 लाख टन जानते हैं) रोजाना का इजाफा हो जाएगा। इसके बाद कच्चे तेल का दाम 85 से 87 डॉलर प्रति बैरल पर आ सकता है।

सोने में 1510 डॉलर प्रति औंस पर प्रतिरोध है और नीचे गिरा तो यह 1350 डॉलर प्रति औंस तक जा सकता है। वहीं, चांदी सट्टेबाजों की कमर तोड़ चुकी है। हालांकि यह जब पलक झपकते ही 46,000 रुपए प्रति किलो से 75,000 रुपए तक पहुंची थी, तभी साफ हो गया था कि अचानक यह धड़ाम से गिरेगी। हम 58,000 रुपए के लक्ष्य के लाथ 65,000 से 75,000 रुपए तक इससे निकलने की सलाह देते रहे। चांदी अब 54,000 से भी नीचे जा चुकी है। हमारा मानना है कि हाल-फिलहाल इसमें सट्टेबाजी खत्म हो चुकी है और इसमें हर बढ़त को शॉर्ट सौदे के मौके के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें अगली लहर 40,000 रुपए तक गिर जाने के बाद शुरू होगी। अभी से 15 महीने इसको जमने में लगेंगे। इन 15 महीनों में चांदी नीचे में 40,000 और ऊपर में 68,000 से 70,000 रुपए के दायरे में घूमेगी। आनेवाले महीनों में सोना हेजिंग का बेहतर विकल्प पेश करेगा।

निफ्टी में 5500 का स्तर अगले 12 महीनों के लिए आधार का काम करेगा। हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि बाजार अभी अपनी नई तलहटी पर है। करेक्शन का आखिरी चरण बाकी था और वो बीते हफ्ते निपट गया। असल में ये करेक्शन सायास लाए जाते हैं। बाजार उस्ताद लोगों की मुठ्ठी में है। लेहमान ब्रदर्स के संकट के बाद बाजार में आई गिरावट से लेकर अब तक भारत में किसी भी फंड मैनेजर ने बड़े नोट नहीं बनाए हैं। यह एक खुला रहस्य है। उस्ताद लोग इस कमी को बनावटी उथल-पुथल लाकर पूरा करते हैं। लेकिन बाजार में जोड़तोड़ लंबे समय तक नहीं चलाई जा सकती। यह हम अपने अनुभव से देख चुके हैं।

पिछले 18 सालों में बाजार की गहराई लगातार घटती गई है जबकि डेरिवेटिव सौदों का वोल्यूम बराबर बढ़ रहा है। कैश बाजार सूख रहा है तो बीएसई का ग्राफ नीचे जा रहा है जबकि एनएसई का ग्राफ उठ रहा है क्योंकि डेरिवेटिव सेगमेंट में वोल्यूम बढ़ रहा है जो पूरी तरफ सटोरिया किस्म का है। उदाहरण के लिए, बीते शुक्रवार 6 मई 2011 को एनएसई में अकेले डेरिवेटिव सेगमेंट में हुआ कारोबार 1.15 लाख करोड़ रुपए का था। इसमें से इंडेक्स ऑप्शन से 82,903 करोड़ रुपए व स्टॉक ऑप्शन से 2619 करोड़ रुपए और इंडेक्स फ्यूचर्स से 15,995 करोड़ रुपए व स्टॉक फ्यूचर्स से 13,501 करोड़ रुपए आए।

इस तरह फ्यूचर्स से लगभग 29,500 करोड़ रुपए का वोल्यूम आया है, जबकि ऑप्शंस से बाकी 85,500 करोड़ रुपए का। लेकिन यहीं पेंच है। ऑप्शंस में वोल्यूम की गणना कांट्रैक्ट के पूरे मूल्य पर की जाती है जबकि प्रीमियम रिस्क केवल आधा फीसदी रहता है। जैसे, इंडेक्स फ्यूचर्स व ऑप्शंस में कुल 35.78 लाख अनुबंध या सौदे हुए जिसमें से 29.56 लाख कॉल व पुट ऑप्शन के थे। लॉट का आकार 50 का है। इस दौरान ओपन इंटरेस्ट में 68 लाख शेयरों (करीब 12 लाख फ्यूचर्स) का इजाफा हो गया।

अगर इंडेक्स ऑप्शंस पर औसत प्रीमियम 100 रुपए प्रति शेयर का लें, तब भी सौदों की वास्तविक लागत मात्र 1500 करोड़ रुपए आती है जो ट्रेडर के खाते से बतौर प्रीमियम काट ली जाती है। लेकिन वोल्यूम की बात आती है तो इसे 82,000 करोड़ दिखाया जाता है क्योंकि इसे सूचकांक के मूल्य 5400, 5500, 5600 या इसी तरह के स्तर पर शामिल किया जाता है। इस तरह सच कहें तो सही वोल्यूम 32,000 से 33,000 करोड़ रुपए का ही रहा होगा, लेकिन वह सामने आ रहा है 1,15,019 करोड़ रुपए के रूप में।

इसे ओपन इंटरेस्ट के आंकड़ों से भी देखा जा सकता है। स्टॉक फ्यूचर्स में ओपन इंटरेस्ट 32,400 करोड़ रुपए और इंडेक्स फ्यूचर्स में 16,000 करोड़ रुपए का है। कॉल व पुट ऑप्शंस में ओपन इंटरेस्ट 79,000 करोड़ रुपए का है। लेकिन इसमें सचमुच लगा धन कभी भी 79,000 करोड़ रुपए का नहीं होता क्योंकि देनदारी सिर्फ प्रीमियम की बनती है जो अमूमन किसी भी दिन 3000 करोड़ रुपए से ज्यादा होती। सच कहें तो निफ्टी में ओपन इंटरेस्ट का सीधा रिश्ता एफ एंड ओ सेगमेंट में लिस्टेड 223 कंपनियों क बाजार पूंजीकरण से होना चाहिए। इन 223 कंपनियों का बाजार पूंजीकरण करीब 58 लाख करोड़ रुपए है जबकि फ्यूचर्स बाजार केवल 32,000 करोड़ रुपए का ओपन इंटरेस्ट दिखा रहा है जिसका कोई मतलब नहीं है।

इससे स्टॉक बार-बार 95 फीसदी प्राइस बैंड में आ जाता है और ऑपरेटर इस 95 फीसदी सीमा का इस्तेमाल उसके भावों के साथ खेलने में करते हैं। यह बाजार से मूल्य तलाशने की हमारी प्रणाली का ऐसा झोल है जिसे दुरुस्त किया जाना जरूरी है। इसके चलते उस्ताद लोग बाजार को अपने हिसाब से नचाते हैं। सरकार इनकी हरकत की सबसे ज्यादा शिकार है क्योंकि उसकी बहुत सारी कंपनियां एफ एंड ओ सेगमेंट में हैं। ऑपरेटरों के खेल के चलते सरकार को अपनी कंपनियों के पब्लिक इश्यू का सही मूल्य तय करने में परेशानी हो रही है।

डेरिवेटिव सौदों के बढ़ने का सीधा नतीजा कैश बाजार के गिरने के रूप में सामने आया है। ब्रोकर भी निवेशकों को सट्टेबाजी के लिए उकसा रहे हैं क्योंकि ऑप्शंस में एक ट्रेड पर चार, और कभी-कभी तो आठ बार ब्रोकरेज मिल जाता है जबकि कैश सौदों पर तो उन्हें दो बार ही ब्रोकरेज मिलता है। लेकिन यह सिलसिला ज्यादा लंबा नहीं खिचेंगा क्योंकि निवेशक इसमें अपना सब कुछ गंवाते जा रहे हैं।

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