सरकारी दावों और मंत्रियों-सलाहकारों के मंत्रों से इतर देश में रोज़गार की असल स्थिति क्या है? लगभग 2.80 करोड़ बेरोज़गार शिक्षित युवा नौकरियों की तलाश में लगे हैं, जबकि करीब 10 करोड़ लोगों ने थककर नौकरी की तलाश ही बंद कर दी है जिसमें से ज्यादातर महिलाएं हैं। रोज़गार पर विश्वसनीय डेटा देनेवाली इकलौती निजी संस्था सीएमआईई के मुताबिक भारत में मार्च 2017 के अंत तक 15 साल से 64 साल की कामकाज़ी उम्र के 42.7% लोगों के पास नौकरी थी। यह मार्च 2026 के अंत तक 4% कटकर 38.7% पर आ गई है। इस दौरान रोज़गार की दर पुरुषों में 70.5% से घटकर 64.8% और महिलाओं में 11.8% से घटकर 9.4% पर आ गई। भारत सरकार के डेटा का तो कहना ही क्या! इसमें तो बिना किसी भुगतान के घर का काम करने को भी रोज़गार मान लिया जाता है। 2011-12 तक हमारा सांख्यिकी मंत्रालय हर पांच साल पर रोज़गारी-बेरोज़गारी का सर्वे जारी करता था। 2017-18 में पहली बार सालाना सावधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) निकाला तो पता चला कि देश में बेरोज़गारी की दर 45 सालों के सर्वोच्च स्तर 6.1% पर पहुंच चुकी है। यह भी ज़मीनी हकीकत से कम थी। फिर भी सरकार ने इस सर्वेक्षण की पद्धति बदल दी। अभी तो हर महीने की 15 तारीख को पिछले महीने तक का फर्जी डेटा आ जाता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…
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