सरकार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफीडीआई) संबंधी नीति को और उदार बनाने पर विचार कर रही है ताकि देश में इंफास्ट्रक्चर के विकास के लिए अगले पांच सालों में निर्धारित एक लाख करोड़ डॉलर की जरूरत पूरी की जा सके। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने शुक्रवार को राजधानी दिल्ली में यह बात कही।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फाइनेंस (आईआईएफ) के एक समारोह में वित्त मंत्री ने कहा, “एफडीआई नीति को भी उदार बनाने के लिए (सरकार में) विचार-विमर्श चल रहा है।” सरकार के इस रुख को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए कि देश में इधर तमाम उपायों के बावजूद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश घट रहा है और इसका प्रतिकूल असर चालू खाते के घाटे पर पड़ रहा है। चालू वित्त वर्ष 2010-11 में अप्रैल से दिसंबर के नौ महीनों में एफडीआई में 23 फीसदी कमी आई है और यह पिछले साल के 20.8 अरब डॉलर से घटकर 16 अरब डॉलर पर आ गया है।
बता दें कि देश द्वारा कमाई गई कुल विदेशी पूंजी और आयात वगैरह पर खर्च की गई कुल विदेशी पूंजी के अंतर से देश का चालू खाता बनता है। अभी विदेशी पूंजी आ कम रही है और बाहर ज्यादा जा रही है। इसलिए चालू खाते में घाटे की स्थिति आ गई है। चालू वित्त वर्ष 2010-11 में अनुमान है कि चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.5 फीसदी रहेगा। बीते वित्त वर्ष 2009-10 में चालू खाते का घाटा जीडीपी का 2.9 फीसदी रहा था।
